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हनुमान जी की आरती: आरती कीजे हनुमान लला की: मूल पाठ और अर्थ

आरती · 15 पद · मूल भाषा: हिंदी

हनुमान जी की आरती: आरती कीजे हनुमान लला की के बारे में

हनुमान जी की सबसे प्रचलित आरती, जो हनुमान चालीसा के बाद गाई जाती है। इसमें लंका जाना, सीता की खबर लाना, संजीवनी लाकर लक्ष्मण को जीवित करना और अहिरावण को हराना जैसे प्रसंग आते हैं; बारहवें पद में तुलसीदास का नाम है।

पाठ: तुलसीदास (बारहवें पद में आया नाम) (Traditional attribution)

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

आरंभ

जाके बल से गिरिवर कंपै ॥ देव पिशाच निकट नहिं झंपै ॥

जिनके बल से बड़े-बड़े पर्वत काँप उठते हैं, उनके पास कोई दुष्ट आत्मा या पिशाच नहीं फटकता।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 19, opening couplet

टेक

आरती कीजे हनुमान लला की ॥ दुष्टदलन रघुनाथ कला की ॥ टेर ॥

हनुमान लला की आरती कीजिए, जो दुष्टों का नाश करने वाले और रघुनाथ (राम) की शक्ति हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 19, refrain

पद 3

लंका से कोट समुद्र सी खाई ॥ जात पवनसुत बार न लाई ॥ १ ॥ आर॰ ॥

लंका जैसा किला और समुद्र जैसी खाई थी, फिर भी पवनपुत्र को वहाँ जाने में देर न लगी।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 19, stanza 1

पद 4

दे बीड़ा रघुनाथ पठाये ॥ लंका जारि सिया सुधि ल्याये ॥ आर॰ ॥ २ ॥

रघुनाथ ने बीड़ा (काम का भार) देकर भेजा; उन्होंने लंका जलाई और सीता की खबर ले आए।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 19, stanza 2

पद 5

जगमग ज्योति अवधपुर राजा । घंटा ताल पखाउज बाजा ॥ आर॰ ॥ ३ ॥

अयोध्या के राजा के आगे दीप जगमगा रहे हैं; घंटा, ताल और पखावज बज रहे हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, pp. 19–20, stanza 3

पद 6

शक्ती बाण लगो लक्ष्मण को ॥ आन सजीवन लषण जिवाये ॥ आर॰ ॥ ४ ॥

लक्ष्मण को शक्ति-बाण लगा; हनुमान ने संजीवनी लाकर लक्ष्मण को जीवित किया।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 4

पद 7

पैठ पताल तोड़ यम कातर ॥ अहिरावण की भुजा उखाड़े ॥ आ॰ ॥ ५ ॥

पाताल में घुसकर, यम के समान भयंकर बंधन तोड़कर, उन्होंने अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ दीं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 5

पद 8

आरति कीजे जैसी तैसी ॥ ध्रुव प्रह्लाद बिभीषण जैसी ॥ आर॰ ॥ ६ ॥

जैसी भी बन पड़े वैसी आरती कीजिए, जैसी ध्रुव, प्रह्लाद और विभीषण ने की।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 6

पद 9

सुर नर मुनि जन आरति उतारें ॥ जै जै जै कपिराज उचारें ॥ आ॰ ॥ ७ ॥

देवता, मनुष्य और मुनि आरती उतारते हैं और "जय जय जय कपिराज" कहते हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 7

पद 10

कंचन थाल कपूर सुहाई ॥ आरति करत अंजनी माई ॥ आर॰ ॥ ८ ॥

सोने की थाली में कपूर की लौ शोभित है, और माता अंजनी आरती कर रही हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 8

पद 11

बांई भुजा से असुर सँहारे ॥ दहनी भुज सुर संत उधारे ॥ आर॰ ॥ ९ ॥

बाईं भुजा से असुरों का संहार किया और दाहिनी भुजा से देवताओं और संतों का उद्धार किया।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 9

पद 12

लंक प्रजार असुर सब मारे ॥ राजा रामजी के कारज सारे ॥ आर॰ ॥ १० ॥

लंका जलाकर सब असुरों को मारा और राजा राम के सारे काम पूरे किए।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 10

पद 13

अंजनि पुत्र महाबलदायक ॥ देव संत के सदा सहायक ॥ आर॰ ॥ ११ ॥

अंजनी के पुत्र महान बल देने वाले हैं और देवताओं व संतों के सदा सहायक हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 11

पद 14

लंक विध्वंसन सिया रघुराई ॥ तुलसि दास कपि आरती गाई ॥ १२ ॥ आर॰ ॥

लंका का विध्वंस हुआ और सीता रघुराई (राम) को मिलीं; तुलसीदास ने कपि (हनुमान) की यह आरती गाई।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 12

पद 15

जो हनुमानजी की आरति गावै ॥ बस वैकुंठ बहुरि नहिं आवै ॥ १३ ॥

जो हनुमान जी की आरती गाता है, वह वैकुंठ में बसता है और फिर (जन्म-मरण में) लौटकर नहीं आता।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 20, stanza 13

स्रोत और लाइसेंस

पाठ "आरती संग्रह" (खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई; फरवरी २०१२ संस्करण) के पृष्ठ १९–२० ("अथ बजरङ्गबालाकी आरती") की छवियों से उतारा गया है। शब्द पुस्तक में जुड़े छपे हैं; पढ़ने के लिए रिक्त स्थान जोड़े गए हैं, पंक्ति के अंत में टूटा शब्द "उ-खाड़े" जोड़ा गया है, कोई अक्षर नहीं बदला गया, और संक्षेप-चिह्न "॰" से लिखा गया है। छपी वर्तनी ("कीजे", "कंपै", "पखाउज", "लषण", "बांई", "दहनी") ज्यों-की-त्यों है। अंतिम पंक्ति "इति आरतिहनुमानजीकी समाप्त" यहाँ नहीं है। यह पाठ प्रचलित पाठ से कई पंक्तियों में भिन्न है। अर्थ संपादकीय हैं।

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