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एकादशी व्रत: अर्थ, विधि और मूल पाठ

व्रत · 3 पद · मूल भाषा: संस्कृत

एकादशी व्रत के बारे में

नारद पुराण के अनुसार एकादशी व्रत विष्णु को प्रिय है और दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। दशमी और द्वादशी को एक बार भोजन और एकादशी को निराहार रहने का विधान है। (यह सार उद्धृत श्लोकों तक सीमित है।)

पाठ: नारद पुराण (पूर्वार्ध, अध्याय २३) (Puranic)

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

व्यावहारिक मार्गदर्शन

उद्देश्य

लाभ

विधि

  1. दशमी: सुबह उठकर दाँत साफ़ करें, विधि से विष्णु को स्नान कराकर इंद्रियों को वश में रखते हुए पूजा करें, और दिन में केवल एक बार भोजन करें। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.7, 23.12
  2. एकादशी: स्नान करके गंध, पुष्प आदि से जनार्दन की पूजा करें; पूरे दिन निराहार रहें और इंद्रियों को वश में रखें। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.13-14
  3. भगवान के सामने यह संकल्प बोलें: "एकादशी को निराहार रहकर मैं अगले दिन भोजन करूँगा; हे पुण्डरीकाक्ष, हे अच्युत, आप मेरी शरण हों", और अपना उपवास भक्ति से उन्हें अर्पित करें। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.15-16
  4. एकादशी को पंचामृत से और द्वादशी को दूध से भगवान का स्नान कराने का विधान है। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.19
  5. रात भगवान के सामने जागरण करें: भजन, वाद्य, नृत्य और पुराण-श्रवण के साथ; सोएँ तो विष्णु के समीप। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.13, 23.17
  6. द्वादशी: सुबह उठकर स्नान करें, विष्णु की पूजा करें और प्रार्थना करें कि इस व्रत से वे प्रसन्न होकर ज्ञान-दृष्टि दें। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.18, 23.20
  7. अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दक्षिणा दें; फिर परिवार के साथ, पंच महायज्ञ करके, मौन होकर स्वयं भोजन करें। स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.21-22

ध्यान रखें

क्या न करें

स्रोत वाले बिंदु उद्धृत श्लोकों का सरल भाषा में सार हैं। "सामान्य प्रचलन" वाले बिंदु इस संग्रह के लिए लिखी गई संपादकीय टिप्पणियाँ हैं।

मूल पाठ और अर्थ

नारद पुराण १.२३.३

एकादशीव्रतं नाम सर्वाभीष्टप्रदं नृणाम् ।. कर्त्तव्यं सर्वथा विप्रविष्णुप्रीतिकरं यतः ।। २३-३ ।।

एकादशी नाम का व्रत मनुष्यों को सब इच्छित फल देने वाला है। हे विप्र, इसे अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह विष्णु को प्रसन्न करता है।

स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.3

नारद पुराण १.२३.४

एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोपरि ।। यो भुंक्ते सोऽत्र पापीयान्परत्र नरकं व्रजेत् ।। २३-४ ।।

दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। जो (उस दिन) खाता है, वह यहाँ पापी होता है और परलोक में नरक जाता है।

स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.4

नारद पुराण १.२३.७

भवेद्दशम्यामेकाशीद्वादश्यां च मुनीश्वर ।। एकादश्यां निराहारो यदि मुक्तिमभीप्सति ।। २३-७ ।।

हे मुनीश्वर, यदि मुक्ति चाहता है तो दशमी और द्वादशी को एक बार भोजन करे और एकादशी को निराहार रहे।

स्रोत: Narada Purana, Purvardha ch. 23, Sanskrit Wikisource, revision 144659, Purvardha 23.7

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकादशी व्रत का उद्देश्य क्या है?
एकादशी व्रत विष्णु को प्रसन्न करने के लिए रखा जाता है; स्रोत इसे सब पापों को शांत करने वाला, सब कामनाएँ पूरी करने वाला और मोक्ष देने वाला कहता है।
एकादशी व्रत कैसे करें?
1. दशमी: सुबह उठकर दाँत साफ़ करें, विधि से विष्णु को स्नान कराकर इंद्रियों को वश में रखते हुए पूजा करें, और दिन में केवल एक बार भोजन करें। 2. एकादशी: स्नान करके गंध, पुष्प आदि से जनार्दन की पूजा करें; पूरे दिन निराहार रहें और इंद्रियों को वश में रखें। 3. भगवान के सामने यह संकल्प बोलें: "एकादशी को निराहार रहकर मैं अगले दिन भोजन करूँगा; हे पुण्डरीकाक्ष, हे अच्युत, आप मेरी शरण हों", और अपना उपवास भक्ति से उन्हें अर्पित करें। 4. एकादशी को पंचामृत से और द्वादशी को दूध से भगवान का स्नान कराने का विधान है। 5. रात भगवान के सामने जागरण करें: भजन, वाद्य, नृत्य और पुराण-श्रवण के साथ; सोएँ तो विष्णु के समीप। 6. द्वादशी: सुबह उठकर स्नान करें, विष्णु की पूजा करें और प्रार्थना करें कि इस व्रत से वे प्रसन्न होकर ज्ञान-दृष्टि दें। 7. अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दक्षिणा दें; फिर परिवार के साथ, पंच महायज्ञ करके, मौन होकर स्वयं भोजन करें।
एकादशी व्रत के क्या लाभ हैं?
सब पापों का शमन और सब कामनाओं का फल। भक्ति से करने वालों को मोक्ष देता है। बड़े पापों से युक्त व्यक्ति भी एकादशी को निराहार रहकर परम गति पाता है। जो नियम से एकादशी व्रत करता है, वह विष्णु-धाम जाता है, जहाँ से लौटना दुर्लभ है।
एकादशी व्रत में क्या ध्यान रखें?
स्रोत के अनुसार यह व्रत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्रियाँ सभी कर सकते हैं। शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की एकादशी को व्रत होता है, यानी महीने में दो बार। पूरा फल चाहने वाला चार भोजन छोड़ता है: दशमी और द्वादशी की रात का भोजन, और बीच का पूरा दिन-रात। व्रत द्वादशी की सुबह खोलने को "पारण" कहते हैं। बहुत से लोग पंचांग में दिया पारण-समय देखकर व्रत खोलते हैं। (सामान्य प्रचलन) जो पूरा निराहार न रह सकें, वे प्रायः फलाहार करते हैं और अन्न (विशेषकर चावल) नहीं खाते। यह प्रचलित रीति है, ऊपर के श्लोकों का कथन नहीं। (सामान्य प्रचलन) उपवास से पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। गर्भवती, बीमार, मधुमेह के रोगी, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से ही कठोर या निर्जल उपवास करें; ऐसे लोग प्रायः फलाहार या एक समय भोजन जैसा हल्का नियम अपनाते हैं। (सामान्य प्रचलन)
एकादशी व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
किसी भी पक्ष की एकादशी को भोजन न करें। एकादशी के दिन भोजन की इच्छा भी न रखें; स्रोत कहता है कि ऐसा व्यक्ति मानो सब पापों को खाना चाहता है। व्रत के दौरान नास्तिकों, मर्यादा तोड़ने वालों, निंदकों और चुगलखोरों से बात न करें।

स्रोत और लाइसेंस

श्लोक स्रोत पृष्ठ से अक्षरशः लिए गए हैं, जिनमें स्रोत की छोटी त्रुटियाँ भी शामिल हैं (जैसे २३-३ में "।." और २३-४ में "उभयोपरि", जो संभवतः "उभयोरपि" है)।

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