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गणेश जी की आरती: गणपति की सेवा मंगल मेवा: मूल पाठ और अर्थ
आरती · 10 पद · मूल भाषा: हिंदी
गणेश जी की आरती: गणपति की सेवा मंगल मेवा के बारे में
उत्तर भारत, विशेषकर राजस्थान में गाई जाने वाली गणेश जी की पारंपरिक आरती। इसमें गणेश की सेवा को मंगल का फल कहा गया है, जिससे सब विघ्न टलते हैं; ऋद्धि-सिद्धि, गुड़ के मोदक, मूषक वाहन, भादों शुक्ल चतुर्थी को जन्म, चंद्रमा को शाप और "विघ्नविनाशक" नाम के प्रसंग आते हैं।
अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।
मूल पाठ और अर्थ
टेक
गणपति की सेवा मंगल मेवा सेवा से सब विघ्न टरैं । तीन लोक तेतीस देवता द्वार खड़े सब अर्ज करैं ॥ टेर ॥
गणपति की सेवा मंगल का मीठा फल है; सेवा से सब विघ्न टल जाते हैं। तीनों लोकों के तैंतीस देवता द्वार पर खड़े होकर विनती करते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 5, refrain
पद 2
ऋधि सिधि दक्षिण वाम विराजैं अरु आनंद सों चमर करैं । धूप दीप औलिया आरती भक्त खड्या जयकार करैं ॥ गणप॰ ॥ १ ॥
दाएँ-बाएँ ऋद्धि और सिद्धि विराजती हैं और आनंद से चँवर डुलाती हैं; धूप, दीप और आरती के साथ भक्त खड़े होकर जयकार करते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 5, stanza 1
पद 3
गुड़ के मोदक भोग लगत हैं मूषक वाहन चढ़ा सरैं । सौम्यरूप सेये गणपति को विघ्न भाज ज्या दूर परैं ॥ गणप॰ ॥ २ ॥
गुड़ के मोदक का भोग लगता है और वे मूषक पर सवार होकर चलते हैं; सौम्य रूप गणपति की सेवा करने से विघ्न भागकर दूर चले जाते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 5, stanza 2
पद 4
भादौं मास और शुक्ल चतुर्थी दिन दोपारा पूर परैं । लियो जन्म गणपति प्रभुजी सुनि दुर्गा मन आनंद भरैं ॥ ग॰ ॥ ३ ॥
भादों मास की शुक्ल चतुर्थी को ठीक दोपहर में प्रभु गणपति ने जन्म लिया; यह सुनकर दुर्गा (पार्वती) का मन आनंद से भर गया।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 5, stanza 3
पद 5
अद्भुत बाजा बज्या इंद्र का देववधू जहँ गान करैं । श्रीशंकर के आनँद उपज्यो नाम सुन्या सब विघ्न टरैं ॥ ग॰ ॥ ४ ॥
इंद्र के अद्भुत बाजे बजे और देवांगनाएँ गाने लगीं; श्रीशंकर के मन में आनंद उमड़ा। उनका नाम सुनने से सब विघ्न टल जाते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 5, stanza 4
पद 6
आनि विधाता बैठे आसन इंद्र अप्सरा निरत करैं । देख वेद ब्रह्माजी जाको विघ्नविनाशक नाम धरैं ॥ ग॰ ॥ ५ ॥
विधाता (ब्रह्मा) आकर आसन पर बैठे और इंद्र की अप्सराएँ नृत्य करने लगीं; वेद देखकर ब्रह्मा जी ने उनका नाम "विघ्नविनाशक" रखा।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 5, stanza 5
पद 7
एकदंत गजवदन विनायक त्रिनयन रूप अनूप धरैं । पगथंभा सा उदर पुष्ट है देख चंद्रमा हास्य करैं ॥ गणप॰ ॥ ६ ॥
एक दाँत, हाथी का मुख, तीन नेत्र: विनायक अनुपम रूप धारण करते हैं; खंभे जैसे पैर और भरा-पूरा पेट देखकर चंद्रमा हँस पड़ा।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, pp. 5–6, stanza 6
पद 8
दै शराप श्रीचंद्रदेव को कलाहीन ततकाल करैं । चौदा लोक में फिरैं गणपती तीन भुवन में राज्य करैं ॥ गण॰ ॥ ७ ॥
उन्होंने चंद्रदेव को शाप देकर तुरंत कलाहीन कर दिया; गणपति चौदह लोकों में विचरते हैं और तीनों भुवनों पर राज्य करते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 6, stanza 7
पद 9
उठ प्रभात जब करे ध्यान कोइ ताके कारज सर्व सरैं । पूजा काले गाव आरती के सिर यश छत्र फिरैं ॥ गण॰ ॥ ८ ॥
जो कोई सुबह उठकर उनका ध्यान करता है उसके सब काम सिद्ध होते हैं; जो पूजा के समय आरती गाता है उसके सिर पर यश का छत्र रहता है।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 6, stanza 8
पद 10
गणपति की पूजा पेला करणी काम सबी निर्विघ्न सरैं । श्रीपरताप गणपतीजी की हाथ जोड़ कर स्तुति करैं ॥ गणपति की सेवा मंगल मेवा॰ ॥ ९ ॥
पहले गणपति की पूजा करनी चाहिए, तब सब काम बिना विघ्न के पूरे होते हैं; "श्रीपरताप" हाथ जोड़कर गणपति जी की स्तुति करता है।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 6, stanza 9
स्रोत और लाइसेंस
- Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers. CC0 1.0 (item metadata, uploaded by the publisher-named account); traditional aartis
पाठ "आरती संग्रह" (खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई; फरवरी २०१२ संस्करण) के पृष्ठ ५–६ ("अथ श्रीगणपतिजीकी आरती") की छवियों से उतारा गया है। आरंभ का "श्रीगणेशाय नमः ॥" यहाँ नहीं है। शब्द पुस्तक में जुड़े छपे हैं; पढ़ने के लिए रिक्त स्थान जोड़े गए हैं (जहाँ शब्द-विभाजन अस्पष्ट है, जैसे "पूजा काले गाव", वह संपादकीय है), कोई अक्षर नहीं बदला गया, और संक्षेप-चिह्न "॰" से लिखा गया है। भाषा में राजस्थानी रूप हैं ("खड्या", "बज्या", "करणी", "सबी")। अंतिम पद में "श्रीपरताप" नाम आता है; पुस्तक कोई रचनाकार नहीं बताती। प्रचलित "जय गणेश जय गणेश देवा" का कोई सत्यापित सार्वजनिक-डोमेन संस्करण इस दौर में नहीं मिला, इसलिए वह शामिल नहीं है। अर्थ संपादकीय हैं।