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श्री हनुमान चालीसा: मूल पाठ और अर्थ
चालीसा · 45 पद · मूल भाषा: अवधी
श्री हनुमान चालीसा के बारे में
तुलसीदास द्वारा रचित चालीस चौपाइयों का यह स्तोत्र हनुमान जी के बल, बुद्धि और राम-भक्ति का गुणगान करता है। आरम्भ और अंत में दोहे हैं।
पाठ: गोस्वामी तुलसीदास (16th century (d. 1623))
अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।
मूल पाठ और अर्थ
मंगलाचरण
श्री हनुमते नमः
श्री हनुमान जी को नमस्कार।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, invocation line
दोहा 1
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥
श्री गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्री रघुवीर (राम) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) देने वाला है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, opening doha 1
दोहा 2
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन-कुमार । बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार ॥
अपने को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे प्रभु, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे क्लेश व विकार दूर कीजिए।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, opening doha 2
चौपाई 1
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥
ज्ञान और गुणों के सागर हनुमान की जय हो। तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले वानरराज की जय हो।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, chaupai 1
चौपाई 2
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥
आप राम के दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं; अंजनी-पुत्र और पवनसुत आपके नाम हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, chaupai 2
चौपाई 3
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥
आप महावीर, पराक्रमी और वज्र जैसे अंगों वाले हैं; आप कुबुद्धि को दूर करते हैं और सुबुद्धि के साथी हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, chaupai 3
चौपाई 4
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥
आपका रंग सोने जैसा है, सुंदर वेश शोभित है, कानों में कुंडल और बाल घुँघराले हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, chaupai 4
चौपाई 5
हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥
आपके हाथों में वज्र और ध्वजा शोभित हैं, और कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, chaupai 5
चौपाई 6
संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥
आप शंकर के अंश और केसरी के पुत्र हैं; आपका तेज और प्रताप महान है और सारा जगत आपकी वंदना करता है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 2, chaupai 6
चौपाई 7
बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥
आप विद्वान, गुणवान और अत्यंत चतुर हैं, और राम का काम करने को सदा उत्सुक रहते हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 7
चौपाई 8
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥
आपको प्रभु की कथा सुनने में आनंद आता है; राम, लक्ष्मण और सीता आपके मन में बसते हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 8
चौपाई 9
सूक्ष्म रुप धरि सियहि दिखावा । बिकट रुप धरि लंक जरावा ॥
आपने छोटा रूप धरकर सीता को दर्शन दिए और विकराल रूप धरकर लंका जलाई।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 9
चौपाई 10
भीम रुप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥
भयंकर रूप धरकर आपने असुरों का संहार किया और रामचंद्र के कार्य पूरे किए।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 10
चौपाई 11
लाय संजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥
संजीवनी बूटी लाकर आपने लक्ष्मण को जीवित किया, तब श्री रघुवीर ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगा लिया।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 11
चौपाई 12
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥
रघुपति ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 12
चौपाई 13
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥
"हजार मुखों वाले (शेषनाग) तुम्हारा यश गाएँ" — ऐसा कहकर श्रीपति ने आपको गले लगाया।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 13
चौपाई 14
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥
सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देव और मुनि, नारद, सरस्वती और शेषनाग भी (आपका गुणगान करते हैं)।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 14
चौपाई 15
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥
यम, कुबेर और सभी दिशाओं के रक्षक जहाँ (आपका यश पूरा नहीं कह पाते), वहाँ कवि और विद्वान कैसे कह सकते हैं?
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 15
चौपाई 16
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥
आपने सुग्रीव पर उपकार किया; उन्हें राम से मिलाकर राजपद दिलाया।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 16
चौपाई 17
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥
विभीषण ने आपकी सलाह मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 17
चौपाई 18
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥
जो सूर्य हजारों योजन दूर है, उसे आपने मीठा फल समझकर निगल लिया।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 18
चौपाई 19
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥
प्रभु की अंगूठी मुँह में रखकर आपने समुद्र लाँघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 19
चौपाई 20
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
संसार के जितने भी कठिन काम हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 20
चौपाई 21
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥
आप राम के द्वार के रक्षक हैं; आपकी आज्ञा के बिना कोई भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 21
चौपाई 22
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहु को डरना ॥
आपकी शरण में आने वाले को सब सुख मिलते हैं; जब आप रक्षक हैं तो किसी से क्या डरना।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 22
चौपाई 23
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनो लोक हाँक ते काँपै ॥
अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं; आपकी हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 23
चौपाई 24
भूत पिसाच निकट नहि आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥
जब कोई महावीर का नाम लेता है, तो भूत-पिशाच पास नहीं आते।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 3, chaupai 24
चौपाई 25
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥
वीर हनुमान का निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 25
चौपाई 26
संकट तें हनुमान छुडावैं । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥
जो मन, कर्म और वचन से हनुमान का ध्यान करता है, उसे वे संकट से छुड़ा लेते हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 26
चौपाई 27
सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥
तपस्वी राजा राम सबसे ऊपर हैं, और उनके सब काम आपने सँवारे।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 27
चौपाई 28
और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥
जो कोई भी अपनी कोई और कामना लेकर आता है, वह जीवन का असीम फल पाता है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 28
चौपाई 29
चारो जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
चारों युगों में आपका प्रताप फैला है; आपका प्रकाश संसार में प्रसिद्ध है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 29
चौपाई 30
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥
आप साधु-संतों के रक्षक, असुरों के विनाशक और राम के दुलारे हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 30
चौपाई 31
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥
माता जानकी ने आपको यह वर दिया कि आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ दे सकें।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 31
चौपाई 32
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥
राम-भक्ति का अमृत आपके पास है; आप सदा रघुपति के सेवक बने रहें।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 32
चौपाई 33
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥
आपके भजन से (भक्त) राम को पाता है और जन्म-जन्मांतर के दुख भूल जाता है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 33
चौपाई 34
अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ॥
अंत समय में वह रघुवर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म ले, हरि-भक्त कहलाता है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 34
चौपाई 35
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥
किसी और देवता को मन में न लाकर भी, केवल हनुमान की सेवा से सब सुख मिल जाते हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 35
चौपाई 36
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
जो बलवान वीर हनुमान का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 36
चौपाई 37
जै जै जै हनुमान गोसाई । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ॥
हे स्वामी हनुमान, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! गुरुदेव की तरह मुझ पर कृपा कीजिए।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 37
चौपाई 38
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महासुख होई ॥
जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधनों से छूटकर महान सुख पाता है।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 38
चौपाई 39
जो यह पढै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है उसे सिद्धि मिलती है; इसके साक्षी स्वयं गौरीपति शिव हैं।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 39
चौपाई 40
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥
तुलसीदास सदा हरि का सेवक है; हे नाथ, मेरे हृदय में निवास कीजिए।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 4, chaupai 40
अंतिम दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप । राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥
हे पवनपुत्र, संकट हरने वाले, मंगलमूर्ति, देवताओं के राजा! आप राम, लक्ष्मण और सीता सहित मेरे हृदय में बसिए।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 5, closing doha
जयकारा
सियावर रामचन्द्र की जय । पवनसुत हनुमान की जय ॥ उमापति महादेव की जय । बोलो भाइ सब संतन्ह की जय ॥
सीता के पति रामचंद्र की जय, पवनपुत्र हनुमान की जय, उमापति महादेव की जय; बोलो भाई, सब संतों की जय।
स्रोत: Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF), PDF p. 5, lines after "॥ इति ॥"
स्रोत और लाइसेंस
- Goswami Tulsidas, "Shri Hanuman Chalisa", Internet Archive item tulsi-hunuman-chalisa (PDF). Public Domain Mark 1.0 (author d. 1623)
पाठ स्रोत संस्करण की वर्तनी में ज्यों-का-त्यों है (जैसे "रुप", "बडाई", "सहस्त्र")। अंतिम पंक्तियाँ "॥ श्रीसीतारामार्पणमस्तु ॥ ॥ इतिश्री ॥" यहाँ सम्मिलित नहीं हैं। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है और प्रत्येक अक्षर का अंतर्निहित "अ" लिखता है।