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लक्ष्मी जी की आरती: जय लक्ष्मी माता: मूल पाठ और अर्थ

आरती · 9 पद · मूल भाषा: हिंदी

लक्ष्मी जी की आरती: जय लक्ष्मी माता के बारे में

देवी लक्ष्मी की आरती, जो दीपावली की लक्ष्मी पूजा और शुक्रवार को गाई जाती है। इसमें लक्ष्मी को ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला के रूप में जगत की माता, सुख-संपत्ति देने वाली और क्षीरसागर से प्रकट चौदह रत्नों में से एक कहा गया है; उनके बिना यज्ञ, वस्त्र और भोजन का वैभव नहीं।

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

टेक

जय लक्ष्मी माता जय लक्ष्मी माता । तुमकूं निशिदिन सेवत हर विष्णू धाता ॥ टेर ॥

हे लक्ष्मी माता, आपकी जय हो। शिव, विष्णु और ब्रह्मा दिन-रात आपकी सेवा करते हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 9, refrain

पद 2

ब्रह्माणी रूद्राणी कमला तुहि है जगमाता । सूर्य चन्द्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता ॥ जय॰ ॥ १ ॥

आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला हैं, आप ही जगत की माता हैं; सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि आपके गुण गाते हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 9, stanza 1

पद 3

दुर्गा रूप निरंजनि सुख संपति दाता । जो कोइ तुमकूं ध्यावत ऋधि सिधि धन पाता ॥ जयल॰ ॥ २ ॥

आप निर्मल दुर्गा-रूपा और सुख-संपत्ति देने वाली हैं; जो कोई आपका ध्यान करता है वह ऋद्धि, सिद्धि और धन पाता है।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 9, stanza 2

पद 4

तू ही है पाताल बसंती तू ही है शुभदाता । कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ॥ जयल॰ ॥ ३ ॥

आप ही पाताल में बसती हैं और आप ही शुभ देने वाली हैं; आप कर्मों का फल प्रकट करती हैं और संसार-सागर से बचाती हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, pp. 9–10, stanza 3

पद 5

जिस घर थारो बासो जाहि में गुण आता । कर न सकै सोइ कर ले मन नहिं धड़काता ॥ जय॰ ॥ ४ ॥

जिस घर में आपका वास होता है उसमें सद्गुण आते हैं; जो काम कोई नहीं कर सकता वह भी हो जाता है और मन नहीं घबराता।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 10, stanza 4

पद 6

तुम विन यज्ञ न होवे वस्त्र न होय राता । खान पान को विभव तुमैं बिन कुण दाता ॥ जयल॰ ॥ ५ ॥

आपके बिना यज्ञ नहीं होता और (शुभ) लाल वस्त्र नहीं मिलता; भोजन-पान का वैभव आपके बिना कौन देगा?

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 10, stanza 5

पद 7

शुभ गुण सुंदर युक्ता क्षीरनिधी जाता । रत्न चतुर्दश तोकूं कोइ भी नहि पाता ॥ जयल॰ ॥ ६ ॥

शुभ गुणों और सुंदरता से युक्त आप क्षीरसागर से प्रकट हुईं; (समुद्र-मंथन के) चौदह रत्न आपकी कृपा के बिना कोई नहीं पाता।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 10, stanza 6

पद 8

या आरती लक्ष्मीजी की जो कोइ नर गाता । उर अनंद अति उमँगै पाप उतर जाता ॥ जयल॰ ॥ ७ ॥

जो कोई लक्ष्मी जी की यह आरती गाता है, उसके हृदय में बहुत आनंद उमड़ता है और पाप उतर जाता है।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 10, stanza 7

पद 9

स्थिर चर जगत बचावै कर्म प्रेर ल्याता । राम प्रताप मैया की शुभ दृष्टी चाता ॥ जय लक्ष्मी माता जय लक्ष्मी माता । तुमको निशिदिन सेवत हर विष्णू धाता ॥ ८ ॥

आप स्थिर और चलायमान सारे जगत की रक्षा करती हैं और कर्मों को प्रेरित करती हैं; "राम प्रताप" माँ की शुभ दृष्टि चाहता है। अंत में टेक दोहराई जाती है।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 10, stanza 8

स्रोत और लाइसेंस

पाठ "आरती संग्रह" (खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई; फरवरी २०१२ संस्करण) के पृष्ठ ९–१० ("अथ आरती श्रीलक्ष्मीजीकी प्रारंभ") की छवियों से उतारा गया है। शब्द पुस्तक में जुड़े छपे हैं; पढ़ने के लिए रिक्त स्थान जोड़े गए हैं, कोई अक्षर नहीं बदला गया, और संक्षेप-चिह्न "॰" से लिखा गया है। छपी वर्तनी ("तुमकूं", "विष्णू", "रूद्राणी", "तुम विन", "तुमैं", "अनंद") ज्यों-की-त्यों है। यह पुराना पाठ है और प्रचलित "ॐ जय लक्ष्मी माता" से कई पंक्तियों में भिन्न है। अंतिम पद में "राम प्रताप" नाम आता है; पुस्तक कोई रचनाकार नहीं बताती। अर्थ संपादकीय हैं।

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