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शिव जी की आरती: जय शिव ओंकारा: मूल पाठ और अर्थ
आरती · 8 पद · मूल भाषा: हिंदी
शिव जी की आरती: जय शिव ओंकारा के बारे में
सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि पर गाई जाने वाली शिव की आरती। पुस्तक इसे "त्रिगुण आरती" कहती है: एक मुख, चार मुख और पाँच मुख वाले रूपों में ब्रह्मा, विष्णु और शिव का वर्णन है, और अंत में कहा गया है कि प्रणव (ॐ) में ये तीनों एक हैं।
पाठ: शिवानन्द स्वामी (अंतिम पद में आया नाम) (Pre-modern)
अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।
मूल पाठ और अर्थ
टेक
जय शिव ओंकारा हर जै शिव ओंकारा । ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धंगी धारा ॥ टेर ॥
हे ओंकार-स्वरूप शिव, हे हर, आपकी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव, और अर्धांगिनी (पार्वती) को धारण करने वाले, आपकी जय हो।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, refrain
पद 2
एकानन चतुरानन पंचानन राजै । हंसासन गरुड़ासन वृहषवान साजै ॥ जैशि॰ ॥ १ ॥
एक मुख (विष्णु), चार मुख (ब्रह्मा) और पाँच मुख (शिव) वाले रूप शोभित हैं; हंस, गरुड़ और बैल उनके वाहन सजे हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 1
पद 3
दोय भुज चार चतुर्भुज दशभुज ते सोहै । तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहै ॥ जैशि॰ ॥ २ ॥
दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले रूप शोभते हैं; इन तीनों रूपों को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 2
पद 4
अक्षमाला वनमाला रुंडमाला धारी । चंदन मृगमद चंदा भाले शुभकारी ॥ जैशि॰ ॥ ३ ॥
आप रुद्राक्ष की माला, वनमाला और मुंडमाला धारण करते हैं; चंदन, कस्तूरी और माथे पर चंद्रमा मंगलकारी हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 3
पद 5
श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे । सनकादिक प्रभुतादिक भूतादिक संगे ॥ जैशि॰ ॥ ४ ॥
शरीर पर श्वेत वस्त्र, पीले वस्त्र और बाघंबर हैं; सनक आदि ऋषि, बड़े-बड़े स्वामी और भूत-गण साथ रहते हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 4
पद 6
कर मध्ये कमंडलु चक्र त्रिशूल धरता । जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ जैशिव॰ ॥ ५ ॥
हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल धारण करते हैं; आप जगत के कर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 5
पद 7
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका । प्रणव अक्षर नु मध्ये ये तीनों एका ॥ जैशिव॰ ॥ ६ ॥
अविवेकी लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग जानते हैं; प्रणव (ॐ) अक्षर में ये तीनों एक हैं।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 6
पद 8
त्रिगुणस्वामीजी की आरती जो कोई गावै । भणत शिवानन्द स्वामी मनवांछित पावै ॥ जैशिव॰ ॥ ७ ॥
जो कोई त्रिगुण-स्वामी की यह आरती गाता है, शिवानन्द स्वामी कहते हैं, वह मनचाहा फल पाता है।
स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 8, stanza 7
स्रोत और लाइसेंस
- Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers. CC0 1.0 (item metadata, uploaded by the publisher-named account); traditional aartis
पाठ "आरती संग्रह" (खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई; फरवरी २०१२ संस्करण) के पृष्ठ ८ ("अथ त्रिगुणआरती शिवजीकी") की छवि से उतारा गया है। पुस्तक में शब्द बिना रिक्त स्थान के जुड़े छपे हैं; पढ़ने के लिए शब्दों के बीच रिक्त स्थान जोड़े गए हैं, कोई अक्षर या चिह्न नहीं बदला गया, और संक्षेप-चिह्न "॰" से लिखा गया है। छपी वर्तनी ज्यों-की-त्यों है, जैसे "जै", "अर्द्धंगी", "वृहषवान" (प्रचलित पाठ "वृषवाहन"), "प्रभुतादिक" (प्रचलित पाठ "गरुड़ादिक") और "प्रणव अक्षर नु मध्ये"। यह पाठ प्रचलित "ॐ जय शिव ओंकारा" से कुछ पंक्तियों में भिन्न है। अर्थ संपादकीय हैं।