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आरती ज्ञानराजा (संत ज्ञानेश्वर की आरती): मूल पाठ और अर्थ
आरती · 4 पद · मूल भाषा: मराठी
आरती ज्ञानराजा (संत ज्ञानेश्वर की आरती) के बारे में
संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) की प्रसिद्ध मराठी आरती। इसमें कहा गया है कि जब संसार से ज्ञान लुप्त हो गया था, तब स्वयं पांडुरंग ने ज्ञानदेव के रूप में अवतार लिया, संत उनकी सेवा करते हैं, और उन्होंने गूढ़ ज्ञान खोलकर पूरे विश्व को ब्रह्म-रूप दिखाया।
पाठ: रामा जनार्दनी (अंतिम पंक्ति में आया नाम) (Pre-modern)
अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।
मूल पाठ और अर्थ
ध्रुवपद (टेक)
आरति ज्ञानराजा । महा कैवल्यतेजा । सेविती साधुसंत । मनु वेधला माझा ॥धृ॥
ज्ञानराज (ज्ञानेश्वर) की आरती, जो कैवल्य (मोक्ष) के महान तेज हैं। साधु-संत उनकी सेवा करते हैं; मेरा मन उन पर मुग्ध हो गया है।
स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 49 (PDF p. 85), Marathi Wikisource, revision 223623, Aarti no. 5, refrain (book p. 49)
चरण १
लोपलें ज्ञान जगी हित नेणती कोणी | अवतार पांडुरंग | नाम ठेवियलें ज्ञानी ।।१।।
संसार से ज्ञान लुप्त हो गया था, कोई अपना हित नहीं जानता था। तब पांडुरंग ने अवतार लिया और उनका नाम "ज्ञानी" (ज्ञानदेव) रखा गया।
स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 49 (PDF p. 85), Marathi Wikisource, revision 223623, Aarti no. 5, stanza 1 (book p. 49)
चरण २
कनकाचें ताट करी। उभ्या गोपिका नारी । नारद तुंबर हो । साम गायन करी ॥२॥
गोपिका-नारियाँ हाथ में सोने की थाली लिए खड़ी हैं, और नारद और तुंबरु साम-गान कर रहे हैं।
स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 49 (PDF p. 85), Marathi Wikisource, revision 223623, Aarti no. 5, stanza 2 (book p. 49)
चरण ३
प्रकट गुह्य बोले । विश्व ब्रह्मचि केलें | रामा जनार्दनी । पायीं टकचि ठलें ॥३॥
उन्होंने गूढ़ ज्ञान को खोलकर कहा और पूरे विश्व को ब्रह्म ही कर दिखाया। रामा जनार्दनी उनके चरणों में अपलक, स्थिर खड़ा रह गया।
स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 49 (PDF p. 85), Marathi Wikisource, revision 223623, Aarti no. 5, stanza 3 (book p. 49)
स्रोत और लाइसेंस
- Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 49 (PDF p. 85), Marathi Wikisource, revision 223623. CC BY-SA 4.0 (edition relicensed by its publisher, Wikimedia VRT ticket 2023060210002841; Marathi Wikisource transcription)
पाठ "नित्यनेमावली" (संकलक गुरुदेव रा. द. रानडे; बारहवीं आवृत्ति, १९८७, अकॅडेमी ऑफ कंपेरेटिव्ह फिलॉसॉफी ॲन्ड रिलिजन, बेळगाव) के मराठी विकिस्रोत प्रतिलेखन से अक्षरशः लिया गया है; इस पुस्तक को प्रकाशक ने CC BY-SA 4.0 के अंतर्गत खुला किया है। छपी हुई वर्तनी ज्यों-की-त्यों है। यह पुस्तक की आरती क्रमांक ५ है (पृ. ४९)। छपे पृष्ठ में पंक्तियाँ बीच में टूटती हैं, इसलिए पंक्ति-विभाजन नहीं रखा गया; शब्द और चिह्न वही हैं। पुस्तक लेखक का नाम नहीं देती; अंतिम पंक्ति में "रामा जनार्दनी" नाम आता है। अंतिम शब्द "ठलें" छपे पाठ में ऐसा ही है (प्रचलित पाठ "ठेलें")। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है और मराठी उच्चारण का मार्गदर्शक नहीं है।