वैदिक दृष्टि
  1. होम
  2. भक्ति संग्रह
  3. कबीर की आरती: ऐसी आरति त्रिभुवन तारै

कबीर की आरती: ऐसी आरति त्रिभुवन तारै: मूल पाठ और अर्थ

आरती · 5 पद · मूल भाषा: हिंदी

कबीर की आरती: ऐसी आरति त्रिभुवन तारै के बारे में

संत कबीर की निर्गुण आरती, जिसमें दीपक, फूल और घंटा भीतर के साधन बन जाते हैं: इंद्रियाँ फूल हैं, ज्ञान दीपक है, शब्द की ध्वनि घंटा है, और आरती निराकार निरंजन देव की होती है। अंतिम पंक्ति में कबीर का नाम आता है।

पाठ: संत कबीर (15th century (d. 1518))

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

पद १

ऐसी आरति त्रिभुवन तारै । तेज:पुंज तहँ प्राण उतारै ॥१॥

ऐसी आरती तीनों लोकों को तार देती है: वहाँ तेज के पुंज (परमात्मा) पर अपने प्राण न्योछावर किए जाते हैं।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 56 (PDF p. 92), Marathi Wikisource, revision 225157, Aarti no. 15, verse 1 (book p. 56)

पद २

पाती पंच पुहुप करि पूजा । देव निरंजन और न दूजा ||२||

पाँच (इंद्रियों) को पत्ते और फूल बनाकर पूजा करो; देव निरंजन (निर्मल, निराकार) है, उसके सिवा कोई दूसरा नहीं।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 56 (PDF p. 92), Marathi Wikisource, revision 225157, Aarti no. 15, verse 2 (book p. 56)

पद ३

तन मन सीस समरपन कीन्हा । प्रगट ज्योति तहँ आतम लीना ॥३॥

तन, मन और सिर अर्पित कर दिया; वहाँ प्रकट ज्योति में आत्मा लीन हो गई।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 56 (PDF p. 92), Marathi Wikisource, revision 225157, Aarti no. 15, verse 3 (book p. 56)

पद ४

दीपक ज्ञान सबद धुनि घंटा | परम पुरिख तहँ देव अनंता ।। ४॥

ज्ञान ही दीपक है, शब्द की ध्वनि ही घंटा; वहाँ परम पुरुष, अनंत देव विराजते हैं।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 56 (PDF p. 92), Marathi Wikisource, revision 225157, Aarti no. 15, verse 4 (book p. 56)

पद ५

परम प्रकाश सकल उजियारा । कहै कबीर मैं दास तुम्हारा ।। ५॥

परम प्रकाश से सब कुछ उजियारा है। कबीर कहते हैं: मैं तुम्हारा दास हूँ।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 56 (PDF p. 92), Marathi Wikisource, revision 225157, Aarti no. 15, verse 5 (book p. 56)

स्रोत और लाइसेंस

पाठ "नित्यनेमावली" (संकलक गुरुदेव रा. द. रानडे; बारहवीं आवृत्ति, १९८७, अकॅडेमी ऑफ कंपेरेटिव्ह फिलॉसॉफी ॲन्ड रिलिजन, बेळगाव) के मराठी विकिस्रोत प्रतिलेखन से अक्षरशः लिया गया है; इस पुस्तक को प्रकाशक ने CC BY-SA 4.0 के अंतर्गत खुला किया है। छपी हुई वर्तनी ज्यों-की-त्यों है। यह पुस्तक की आरती क्रमांक १५ है (पृ. ५६), जो आठवीं आवृत्ति (१९६०) में जोड़ी गई। भाषा कबीर की संत-भाषा (पुरानी हिंदी) है, मराठी नहीं। छपे पृष्ठ में पंक्तियाँ बीच में टूटती हैं, इसलिए पंक्ति-विभाजन नहीं रखा गया; शब्द और चिह्न वही हैं, जिनमें "तेज:पुंज" का कोलन भी है। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है और प्रत्येक अंतर्निहित "अ" लिखता है; यह उच्चारण-मार्गदर्शक नहीं है।

संबंधित