वैदिक दृष्टि
  1. होम
  2. भक्ति संग्रह
  3. महाशिवरात्रि पूजा

महाशिवरात्रि पूजा: अर्थ, विधि और मूल पाठ

पूजा · 7 पद · मूल भाषा: संस्कृत

महाशिवरात्रि पूजा के बारे में

शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय ३८) में शिव विष्णु को बताते हैं कि उनके व्रतों में शिवरात्रि व्रत सबसे बलवान है। यह माघ कृष्ण चतुर्दशी की उस रात किया जाता है जो आधी रात तक रहे: प्रातः संकल्प, रात के चारों प्रहरों में अलग-अलग सामग्री से पूजा, रात भर जागरण, और अगली सुबह पूजा के बाद व्रत का समापन। यह विधि इन्हीं श्लोकों से ली गई है।

पाठ: शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय ३८) (Puranic)

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

व्यावहारिक मार्गदर्शन

उद्देश्य

लाभ

विधि

  1. प्रातः उठकर स्नान आदि नित्य कर्म करें, फिर शिव मंदिर जाकर विधि से पूजा करें और शिव को नमस्कार करें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.26-27
  2. शिव के सामने संकल्प लें (नीचे श्लोक २ और ३ में संकल्प के शब्द हैं): कि आप शिवरात्रि व्रत करना चाहते हैं, यह बिना विघ्न के पूरा हो, और काम आदि भीतरी शत्रु बाधा न दें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.27-29
  3. पूजा-सामग्री इकट्ठी करें। रात को किसी प्रसिद्ध शिवलिंग के पास जाकर सामग्री शिव के दक्षिण या पश्चिम ओर रखें, फिर से स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और तीन बार आचमन करके पूजा आरम्भ करें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.30-33
  4. रात के चारों प्रहरों में हर प्रहर में गीत, वाद्य और नृत्य के साथ भक्ति से पूजा करें और मंत्र जपें। मंत्र जानने वाला मिट्टी का शिवलिंग (पार्थिव लिंग) बनाकर उसकी पूजा कर सकता है। अनेक स्तोत्रों से शिव को प्रसन्न करें, और व्रत का माहात्म्य पढ़ें या सुनें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.35-39
  5. पहला प्रहर: पार्थिव लिंग की अनेक उपचारों से पूजा करें। पहले पाँच द्रव्य, हर एक उसके अपने मंत्र के साथ अलग-अलग अर्पित करें, फिर जलधारा दें; जलधारा देते हुए मंत्र १०८ बार पढ़ें। गुरु से मिला मंत्र हो तो उससे, नहीं तो नाम-मंत्र से पूजा करें। चंदन, अखंड चावल और काले तिल चढ़ाएँ। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.47-52
  6. कमल और कनेर (करवीर) के फूल आठ नाम-मंत्रों से चढ़ाएँ: भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान, हर नाम के आगे "श्री" लगाकर, चतुर्थी विभक्ति में (जैसे "श्रीभवाय")। फिर धूप, दीप, पके अन्न का नैवेद्य, श्रीफल से अर्घ्य और पान अर्पित करें; उसके बाद नमस्कार, ध्यान और गुरु-मंत्र का जप करें, या गुरु-मंत्र न हो तो पंचाक्षर मंत्र का। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.53-57
  7. धेनु-मुद्रा दिखाकर शुद्ध जल से तर्पण करें, और सामर्थ्य के अनुसार पाँच ब्राह्मणों के भोजन का संकल्प करें। प्रहर पूरा होने तक उत्सव करें, फिर पूजा का फल शिव को अर्पित करके उस प्रहर की पूजा समाप्त करें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.58-59
  8. दूसरा प्रहर: फिर संकल्प करें (या एक ही बार में चारों प्रहरों का संकल्प कर लें)। पहले जैसे द्रव्यों और जलधारा से पूजा करें, और मंत्र-जप पहले से दुगुना करें। तिल, जौ और कमल से, और विशेष रूप से बेलपत्र से पूजा करें। बिजौरे (बीजपूर) से अर्घ्य और खीर का नैवेद्य दें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.60-64
  9. तीसरा प्रहर: पहले की तरह पूजा करें, पर जौ की जगह गेहूँ और आक (अर्क) के फूल लें। तरह-तरह की धूप और दीप, पुए और अनेक प्रकार के शाक का नैवेद्य दें, कपूर से आरती करें, अनार से अर्घ्य दें और जप फिर दुगुना करें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.65-68
  10. चौथा प्रहर: उड़द, प्रियंगु, मूँग या सात धान्यों से, शंखपुष्पी के फूलों और बेलपत्र से पूजा करें। तरह-तरह की मिठाइयों या उड़द से बने अन्न का नैवेद्य, केले या अनेक फलों से अर्घ्य दें, और जप फिर दुगुना करें। अरुणोदय (भोर की लाली) तक भक्तों के साथ गीत, वाद्य और नृत्य में समय बिताएँ। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.69-74
  11. सूर्योदय होने पर फिर स्नान करके अनेक उपहारों से शिव की पूजा और अभिषेक करें। प्रहरों की संख्या के अनुसार ब्राह्मणों और संन्यासियों को दान और भोजन दें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.75-76
  12. शिव को नमस्कार करके पुष्पांजलि दें और हाथ जोड़कर प्रार्थना करें (नीचे श्लोक ५–७)। ब्राह्मणों से तिलक और आशीर्वाद लें, व्रत के नियम का विसर्जन करें, और यथाशक्ति शिवभक्त ब्राह्मणों और संन्यासियों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करें। स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.41-45, 38.77-82
  13. घर पर बहुत से लोग इसे सरल रूप में करते हैं: रात के चारों प्रहरों में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी और शहद से अभिषेक, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय" का जप और रात भर जागरण। यह प्रचलित रीति है, ऊपर के श्लोकों का कथन नहीं। (सामान्य प्रचलन)

ध्यान रखें

क्या न करें

स्रोत वाले बिंदु उद्धृत श्लोकों का सरल भाषा में सार हैं। "सामान्य प्रचलन" वाले बिंदु इस संग्रह के लिए लिखी गई संपादकीय टिप्पणियाँ हैं।

मूल पाठ और अर्थ

शिव पुराण ४.३८.२४

माघस्य ह्यसिते पक्षे विशिष्टा सातिकीर्तिता ।। निशीथव्यापिनी ग्राह्या हत्याकोटिविनाशिनी ।।२४।।

माघ के कृष्ण पक्ष की (चतुर्दशी, यानी शिवरात्रि) विशेष रूप से प्रसिद्ध है। जो चतुर्दशी आधी रात (निशीथ) में व्याप्त हो, वही लेनी चाहिए; वह करोड़ों हत्याओं जैसे घोर पापों का नाश करने वाली है।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.24

शिव पुराण ४.३८.२८

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते ।। कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव ।। २८ ।।

हे देवों के देव, महादेव, नीलकंठ, आपको नमस्कार है। हे देव, मैं आपका शिवरात्रि व्रत करना चाहता हूँ।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.28

शिव पुराण ४.३८.२९

तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति ।। कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।२९।।

हे देवेश, आपके प्रभाव से यह व्रत बिना विघ्न के पूरा हो, और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.29

शिव पुराण ४.३८.५४

भवः शर्वस्तथा रुद्रः पुनः पशुपतिस्तथा ।। उग्रो महांस्तथा भीम ईशान इति तानि वै ।। ५४ ।।

भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान: ये (शिव के आठ नाम-मंत्र) हैं।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.54

शिव पुराण ४.३८.७८

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड ।। कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथा योग्यं तथा कुरु ।। ७८ ।।

हे मृड (कृपालु शिव), मैं सदा आपका हूँ, मेरे प्राण और मन आपमें लगे हैं। हे कृपानिधि, यह जानकर जैसा उचित हो वैसा करें।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.78

शिव पुराण ४.३८.७९

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया ।। कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूतनाथ प्रसीद मे ।।७९।।

अज्ञान से या जानकर मैंने जो जप-पूजा आदि की है, हे भूतनाथ, अपनी कृपालुता से उसे स्वीकार करके मुझ पर प्रसन्न हों।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.79

शिव पुराण ४.३८.८०

अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च ।। तेनैव प्रीयतां देवः शंकरः सुखदायकः।।4.38.८०।।

इस उपवास से जो भी फल उत्पन्न हुआ है, उसी से सुख देने वाले भगवान शंकर प्रसन्न हों।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 38, Sanskrit Wikisource, revision 104501, Koti Rudra Samhita 38.80

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाशिवरात्रि पूजा का उद्देश्य क्या है?
शिव को प्रसन्न करने वाले व्रतों में शिवरात्रि व्रत सबसे बलवान है; जो सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों चाहते हैं, उन्हें यही व्रत करना चाहिए। स्रोत के अनुसार यह व्रत सबके लिए हितकारी है: कामना वाले और बिना कामना वाले, सभी वर्णों और आश्रमों के लोग, स्त्रियाँ, बच्चे, सेवक-सेविकाएँ और हर देहधारी।
महाशिवरात्रि पूजा कैसे करें?
1. प्रातः उठकर स्नान आदि नित्य कर्म करें, फिर शिव मंदिर जाकर विधि से पूजा करें और शिव को नमस्कार करें। 2. शिव के सामने संकल्प लें (नीचे श्लोक २ और ३ में संकल्प के शब्द हैं): कि आप शिवरात्रि व्रत करना चाहते हैं, यह बिना विघ्न के पूरा हो, और काम आदि भीतरी शत्रु बाधा न दें। 3. पूजा-सामग्री इकट्ठी करें। रात को किसी प्रसिद्ध शिवलिंग के पास जाकर सामग्री शिव के दक्षिण या पश्चिम ओर रखें, फिर से स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और तीन बार आचमन करके पूजा आरम्भ करें। 4. रात के चारों प्रहरों में हर प्रहर में गीत, वाद्य और नृत्य के साथ भक्ति से पूजा करें और मंत्र जपें। मंत्र जानने वाला मिट्टी का शिवलिंग (पार्थिव लिंग) बनाकर उसकी पूजा कर सकता है। अनेक स्तोत्रों से शिव को प्रसन्न करें, और व्रत का माहात्म्य पढ़ें या सुनें। 5. पहला प्रहर: पार्थिव लिंग की अनेक उपचारों से पूजा करें। पहले पाँच द्रव्य, हर एक उसके अपने मंत्र के साथ अलग-अलग अर्पित करें, फिर जलधारा दें; जलधारा देते हुए मंत्र १०८ बार पढ़ें। गुरु से मिला मंत्र हो तो उससे, नहीं तो नाम-मंत्र से पूजा करें। चंदन, अखंड चावल और काले तिल चढ़ाएँ। 6. कमल और कनेर (करवीर) के फूल आठ नाम-मंत्रों से चढ़ाएँ: भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान, हर नाम के आगे "श्री" लगाकर, चतुर्थी विभक्ति में (जैसे "श्रीभवाय")। फिर धूप, दीप, पके अन्न का नैवेद्य, श्रीफल से अर्घ्य और पान अर्पित करें; उसके बाद नमस्कार, ध्यान और गुरु-मंत्र का जप करें, या गुरु-मंत्र न हो तो पंचाक्षर मंत्र का। 7. धेनु-मुद्रा दिखाकर शुद्ध जल से तर्पण करें, और सामर्थ्य के अनुसार पाँच ब्राह्मणों के भोजन का संकल्प करें। प्रहर पूरा होने तक उत्सव करें, फिर पूजा का फल शिव को अर्पित करके उस प्रहर की पूजा समाप्त करें। 8. दूसरा प्रहर: फिर संकल्प करें (या एक ही बार में चारों प्रहरों का संकल्प कर लें)। पहले जैसे द्रव्यों और जलधारा से पूजा करें, और मंत्र-जप पहले से दुगुना करें। तिल, जौ और कमल से, और विशेष रूप से बेलपत्र से पूजा करें। बिजौरे (बीजपूर) से अर्घ्य और खीर का नैवेद्य दें। 9. तीसरा प्रहर: पहले की तरह पूजा करें, पर जौ की जगह गेहूँ और आक (अर्क) के फूल लें। तरह-तरह की धूप और दीप, पुए और अनेक प्रकार के शाक का नैवेद्य दें, कपूर से आरती करें, अनार से अर्घ्य दें और जप फिर दुगुना करें। 10. चौथा प्रहर: उड़द, प्रियंगु, मूँग या सात धान्यों से, शंखपुष्पी के फूलों और बेलपत्र से पूजा करें। तरह-तरह की मिठाइयों या उड़द से बने अन्न का नैवेद्य, केले या अनेक फलों से अर्घ्य दें, और जप फिर दुगुना करें। अरुणोदय (भोर की लाली) तक भक्तों के साथ गीत, वाद्य और नृत्य में समय बिताएँ। 11. सूर्योदय होने पर फिर स्नान करके अनेक उपहारों से शिव की पूजा और अभिषेक करें। प्रहरों की संख्या के अनुसार ब्राह्मणों और संन्यासियों को दान और भोजन दें। 12. शिव को नमस्कार करके पुष्पांजलि दें और हाथ जोड़कर प्रार्थना करें (नीचे श्लोक ५–७)। ब्राह्मणों से तिलक और आशीर्वाद लें, व्रत के नियम का विसर्जन करें, और यथाशक्ति शिवभक्त ब्राह्मणों और संन्यासियों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करें। 13. घर पर बहुत से लोग इसे सरल रूप में करते हैं: रात के चारों प्रहरों में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी और शहद से अभिषेक, बेलपत्र, दीपक, "ॐ नमः शिवाय" का जप और रात भर जागरण। यह प्रचलित रीति है, ऊपर के श्लोकों का कथन नहीं। (सामान्य प्रचलन)
महाशिवरात्रि पूजा के क्या लाभ हैं?
माघ कृष्ण चतुर्दशी की यह रात्रि करोड़ों बड़े पापों का नाश करने वाली कही गई है। जो इस प्रकार व्रत करता है, शिव उससे दूर नहीं रहते; बिना विशेष प्रयास के किया गया यह व्रत भी मुक्ति का बीज बन जाता है। शिव कहते हैं कि इस व्रत से वे सब दुःख हरते हैं और सांसारिक सुख, मोक्ष तथा हर मनचाहा फल देते हैं।
महाशिवरात्रि पूजा में क्या ध्यान रखें?
माघ के कृष्ण पक्ष की वह चतुर्दशी लें जो आधी रात (निशीथ काल) में व्याप्त हो। अमांत पंचांग में यह माघ कृष्ण चतुर्दशी है और उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी; दोनों एक ही रात के नाम हैं, जिसे महाशिवरात्रि कहते हैं। (सामान्य प्रचलन) रात भर उत्सव के साथ प्रेम से जागरण करें। स्रोत के अनुसार यह व्रत भक्ति से हर महीने भी किया जा सकता है (मासिक शिवरात्रि), और बाद में उद्यापन करने से उसका पूरा फल मिलता है। उपवास से पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। गर्भवती, बीमार, मधुमेह के रोगी, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से ही कठोर या निर्जल उपवास करें; ऐसे लोग प्रायः फलाहार या एक समय भोजन जैसा हल्का नियम अपनाते हैं। (सामान्य प्रचलन)
महाशिवरात्रि पूजा में क्या नहीं करना चाहिए?
शिव की पूजा बिना मंत्र के न करें; हर द्रव्य उसके अपने मंत्र से अर्पित करें। शिवरात्रि को भोजन न करें; इसी पुराण की शिवरात्रि-कथा में हिरन इसे पाप-कर्मों की सूची में गिनाता है।

स्रोत और लाइसेंस

श्लोक स्रोत पृष्ठ से अक्षरशः लिए गए हैं, स्रोत के "4.38.80" जैसे क्रमांक सहित। अध्याय के आरम्भ (३८.१०, ३८.१५–१६) में ये शैव व्रत द्विजों के लिए कहे गए हैं और श्लोक १६ कहता है कि इन्हें छोड़ने वाले द्विज चोर बनते हैं; जाति पर आधारित यह अंश मार्गदर्शन में नहीं लिया गया। स्रोत स्वयं (३८.२१–२३) कहता है कि यह व्रत सबके लिए हितकारी है। "पंचद्रव्य" (३८.४८) के पाँच द्रव्य स्रोत में गिनाए नहीं गए, इसलिए यहाँ उनके नाम नहीं जोड़े गए। "क्या न करें" का एक बिंदु इसी पुराण के अध्याय ४० (श्लोक ६४) से है। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है।

संबंधित