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आरती: ओम जय जगदीश हरे: मूल पाठ और अर्थ

आरती · 10 पद · मूल भाषा: हिंदी

आरती: ओम जय जगदीश हरे के बारे में

उत्तर भारत में लगभग हर पूजा के अंत में गाई जाने वाली आरती। इसमें भक्त जगत के स्वामी (जगदीश) को माता-पिता, अंतर्यामी और करुणा का सागर कहकर शरण माँगता है, विषय-विकार और पाप दूर करने की प्रार्थना करता है, और अंत में तन, मन, धन सब उन्हीं को अर्पित करता है।

पाठ: पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (परंपरा से मान्य रचनाकार) (19th century (d. 1881))

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

टेक

ओ३म् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । भक्त जनों के संकट, क्षणमें दूर करे । ओ३म्...

हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप भक्तों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 1–2

पद 2

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का, स्वामी दुख॰ सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का । ओ३म्...

जो आपका ध्यान करता है उसे फल मिलता है और मन का दुख मिट जाता है; घर में सुख-संपत्ति आती है और शरीर का कष्ट मिटता है।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 3–4

पद 3

मात पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण॰ तुम बिन और न दूजा, आश करूं जिसकी । ओ३म्...

आप ही मेरे माता-पिता हैं, और किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं जिससे आशा करूँ।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 5–6

पद 4

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम॰ पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी । ओ३म्...

आप पूर्ण परमात्मा और अंतर्यामी हैं; आप ही परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 7–8

पद 5

तुम करुणा के सागर, तुम पालन कर्ता, स्वामी तुम॰ मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता । ओ३म्...

आप करुणा के सागर और पालनहार हैं। मैं मूर्ख, दुष्ट और कामनाओं से भरा हूँ; हे पालनहार, कृपा कीजिए।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 9–10

पद 6

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपती, स्वामी सबके॰ किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमती । ओ३म्...

आप एक हैं, इंद्रियों से परे हैं और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं कुबुद्धि आपसे किस विधि मिलूँ?

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 11–12

पद 7

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे, स्वामी तुम॰ अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे । ओ३म्...

आप दीनों के बंधु, दुख हरने वाले और मेरे रक्षक हैं। अपना हाथ उठाइए (आशीर्वाद दीजिए), मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 13–14

पद 8

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप॰ श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा । ओ३म्...

हे देव, विषयों के विकार मिटाइए और पाप हरिए; श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा बढ़ाइए।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 15–16

पद 9

तन, मन, धन जो कुछ है, सब ही है तेरा, स्वामी सब॰ तेरा तुझको अर्पित, क्या लागे मेरा । ओ३म्...

तन, मन, धन जो कुछ है, सब आपका ही है। आपका ही आपको अर्पित है, इसमें मेरा क्या लगता है?

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 17–18

टेक (अंत में)

जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे । ओ३म्...

टेक दोहराई जाती है: हे जगदीश हरि, आपकी जय हो; आप भक्तों के संकट क्षण में दूर करते हैं।

स्रोत: Arti Sangrah, Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, February 2012 (Samvat 2068), Internet Archive item arti-sangrah-khemraj-publishers, p. 28, lines 19–20

स्रोत और लाइसेंस

पाठ "आरती संग्रह" (खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई; फरवरी २०१२ संस्करण) के पृष्ठ २८ की छवि से अक्षरशः उतारा गया है; यह पुस्तक प्रकाशक-नाम वाले खाते ने इंटरनेट आर्काइव पर CC0 के अंतर्गत रखी है। छपी हुई वर्तनी ("ओ३म्", "सम्पति", "गहूं", "क्षणमें") ज्यों-की-त्यों है; छपे पाठ के संक्षेप-चिह्न "स्वामी दुख०" आदि को देवनागरी संक्षेप-चिह्न "॰" से लिखा गया है। रचना परंपरा से पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (मृत्यु १८८१) की मानी जाती है; पुस्तक कोई रचनाकार नहीं बताती। अर्थ संपादकीय हैं। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है और प्रत्येक अंतर्निहित "अ" लिखता है।

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