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प्रदोष व्रत: अर्थ, विधि और मूल पाठ

व्रत · 3 पद · मूल भाषा: संस्कृत

प्रदोष व्रत के बारे में

प्रदोष त्रयोदशी तिथि की संध्या का समय है। स्कन्द पुराण के प्रदोष-माहात्म्य के अनुसार इस समय फल चाहने वाले को महादेव की पूजा करनी चाहिए, और पूजा, जप, होम, कथा तथा स्तुति नियम से करनी चाहिए। (यह सार इन्हीं श्लोकों पर आधारित है; उपवास, सामग्री या मुहूर्त जैसे विवरण यहाँ स्रोत से नहीं लिए गए हैं।)

पाठ: स्कन्द पुराण (ब्रह्मखण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अध्याय ६) (Puranic)

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

व्यावहारिक मार्गदर्शन

उद्देश्य

लाभ

विधि

  1. दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की त्रयोदशी को निराहार रहें। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.2
  2. सूर्यास्त से तीन घटी पहले (एक घटी = २४ मिनट, यानी लगभग ७२ मिनट पहले) स्नान करें। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.2
  3. श्वेत वस्त्र पहनें, मौन और नियम में रहें, संध्या और जप करके शिव-पूजा आरम्भ करें। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.3
  4. देवता के सामने स्थान को नए जल से लीपकर सुंदर मंडल बनाएँ, धुले वस्त्र, चँदोवे, फल, फूल और नए अंकुरों से सजाएँ, पाँच रंगों का कमल बनाएँ, और सब पूजा-सामग्री तैयार रखकर शुद्ध होकर स्थिर आसन पर बैठें। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.4-6
  5. स्रोत इसके बाद आगम-विधि का क्रम देता है: आत्मशुद्धि, तीन प्राणायाम, न्यास, शिव और उनके बाईं ओर पार्वती का ध्यान, फिर गंध आदि उपचारों से क्रमशः पूजा। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.7-25
  6. घर पर बहुत से लोग सरल पूजा करते हैं: शिवलिंग पर जल या दूध से अभिषेक, बेलपत्र, दीपक, और "ॐ नमः शिवाय" का जप। यह प्रचलित रीति है, ऊपर के श्लोकों का कथन नहीं। (सामान्य प्रचलन)
  7. प्रदोष में इस प्रकार पूजा करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दक्षिणा देकर संतुष्ट करें। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.71
  8. पूजा के अंत में प्रदोष-माहात्म्य सुनें या सुनाएँ। स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.162

ध्यान रखें

क्या न करें

स्रोत वाले बिंदु उद्धृत श्लोकों का सरल भाषा में सार हैं। "सामान्य प्रचलन" वाले बिंदु इस संग्रह के लिए लिखी गई संपादकीय टिप्पणियाँ हैं।

मूल पाठ और अर्थ

स्कन्द पुराण ३.३.६.५

त्रयोदश्यां तिथौ सायं प्रदोषः परिकीर्त्तितः ।। तत्र पूज्यो महादेवो नान्यो देवः फलार्थिभिः ।। ५ ।।

त्रयोदशी तिथि की संध्या को "प्रदोष" कहा गया है। उस समय फल चाहने वालों को महादेव की ही पूजा करनी चाहिए, किसी अन्य देवता की नहीं।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.5

स्कन्द पुराण ३.३.६.७

प्रदोषसमये देवः कैलासे रजतालये ।। करोति नृत्यं विबुधैरभिष्टुतगुणोदयः ।। ७ ।।

प्रदोष के समय भगवान शिव कैलास के रजत-भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों की स्तुति करते हैं।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.7

स्कन्द पुराण ३.३.६.८

अतः पूजा जपो होमस्तत्कथास्तद्गुणस्तवः ।। कर्त्तव्यो नियतं मर्त्यैश्चतुर्वर्गफला र्थिभिः ।। ८ ।।

इसलिए चारों पुरुषार्थ चाहने वाले मनुष्यों को (इस समय) नियम से उनकी पूजा, जप, होम, उनकी कथाएँ और गुणों की स्तुति करनी चाहिए।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.8

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रदोष व्रत का उद्देश्य क्या है?
त्रयोदशी की संध्या (प्रदोष) में महादेव की पूजा करना; स्रोत के अनुसार उस समय फल चाहने वालों के लिए पूज्य केवल महादेव हैं। प्रदोष में शंकर की पूजा को स्रोत "महाव्रत" और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का श्रेष्ठ साधन कहता है।
प्रदोष व्रत कैसे करें?
1. दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की त्रयोदशी को निराहार रहें। 2. सूर्यास्त से तीन घटी पहले (एक घटी = २४ मिनट, यानी लगभग ७२ मिनट पहले) स्नान करें। 3. श्वेत वस्त्र पहनें, मौन और नियम में रहें, संध्या और जप करके शिव-पूजा आरम्भ करें। 4. देवता के सामने स्थान को नए जल से लीपकर सुंदर मंडल बनाएँ, धुले वस्त्र, चँदोवे, फल, फूल और नए अंकुरों से सजाएँ, पाँच रंगों का कमल बनाएँ, और सब पूजा-सामग्री तैयार रखकर शुद्ध होकर स्थिर आसन पर बैठें। 5. स्रोत इसके बाद आगम-विधि का क्रम देता है: आत्मशुद्धि, तीन प्राणायाम, न्यास, शिव और उनके बाईं ओर पार्वती का ध्यान, फिर गंध आदि उपचारों से क्रमशः पूजा। 6. घर पर बहुत से लोग सरल पूजा करते हैं: शिवलिंग पर जल या दूध से अभिषेक, बेलपत्र, दीपक, और "ॐ नमः शिवाय" का जप। यह प्रचलित रीति है, ऊपर के श्लोकों का कथन नहीं। (सामान्य प्रचलन) 7. प्रदोष में इस प्रकार पूजा करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दक्षिणा देकर संतुष्ट करें। 8. पूजा के अंत में प्रदोष-माहात्म्य सुनें या सुनाएँ।
प्रदोष व्रत के क्या लाभ हैं?
दुःख, शोक और भय से पीड़ित लोगों के लिए प्रदोष में पार्वतीपति का पूजन मंगलकारी है; जो प्रदोष में पूजा करता है वह विपत्तियों से छूटता है। शिव-पूजन से दरिद्रता, दुःख और पहाड़ जैसे ऋण का भार दूर होकर व्यक्ति संपत्ति से सम्मानित होता है। स्रोत इस शिव-पूजा को सब पापों का नाश करने वाली, सब दरिद्रता मिटाने वाली और सब इच्छित वर देने वाली कहता है। जो प्रदोष में शिव-पूजा के अंत में यह माहात्म्य सुनता या सुनाता है, उसे स्रोत के अनुसार सैकड़ों जन्मों तक दरिद्रता नहीं होती।
प्रदोष व्रत में क्या ध्यान रखें?
प्रदोष-काल त्रयोदशी तिथि की संध्या है, इसलिए पंचांग में त्रयोदशी और सूर्यास्त दोनों देखें। जिस दिन सूर्यास्त के समय त्रयोदशी हो, प्रायः उसी दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है। सोमवार को पड़ने वाले प्रदोष को "सोम प्रदोष" और शनिवार वाले को "शनि प्रदोष" कहा जाता है। (सामान्य प्रचलन) व्रत प्रायः संध्या-पूजा के बाद खोला जाता है। (सामान्य प्रचलन) उपवास से पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। गर्भवती, बीमार, मधुमेह के रोगी, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से ही कठोर या निर्जल उपवास करें; ऐसे लोग प्रायः फलाहार या एक समय भोजन जैसा हल्का नियम अपनाते हैं। (सामान्य प्रचलन)
प्रदोष व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
प्रदोष-काल में किसी अन्य देवता की पूजा न करें; स्रोत के अनुसार उस समय केवल महादेव पूज्य हैं। त्रयोदशी को भोजन न करें, और पूजा के समय बोलें नहीं। शिव की संपत्ति (मंदिर का धन या सामग्री) न लें। स्रोत कहता है कि यह पूजा बाकी सब पाप दूर करती है, पर इस पाप का कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया।

स्रोत और लाइसेंस

श्लोक स्रोत पृष्ठ से अक्षरशः लिए गए हैं; श्लोक ८ में "फला र्थिभिः" का रिक्त स्थान स्रोत में ही है।

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