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प्रदोष व्रत कथा: मूल पाठ और अर्थ

कथा · 18 पद · मूल भाषा: संस्कृत

प्रदोष व्रत कथा के बारे में

स्कन्द पुराण के प्रदोष-माहात्म्य की कथा: विदर्भ के राजा सत्यरथ युद्ध में मारे जाते हैं और रानी वन में पुत्र को जन्म देकर मगर का शिकार हो जाती है। उमा नाम की एक निर्धन ब्राह्मणी, भिक्षु-वेश में आए शिव के कहने पर, उस राजकुमार (धर्मगुप्त) को अपने पुत्र शुचिव्रत के साथ पालती है। शांडिल्य मुनि बताते हैं कि पिछले जन्म में प्रदोष-पूजा अधूरी छोड़ने से यह दुर्दशा हुई, और दोनों बालकों को प्रदोष में शिव-पूजा का उपदेश देते हैं। पूजा करते हुए ब्राह्मण-पुत्र को खज़ाना मिलता है और राजकुमार गंधर्व-कन्या अंशुमती से विवाह करके अपना राज्य वापस पाता है। यहाँ कथा के मुख्य श्लोक दिए गए हैं।

पाठ: स्कन्द पुराण (ब्रह्मखण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अध्याय ६–७) (Puranic)

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

स्कन्द पुराण ३.३.६.१६

आसीद्विदर्भविषये नाम्ना सत्यरथो नृपः ।। सर्वधर्मरतो धीरः सुशीलः सत्यसंगरः ।। १६ ।।

विदर्भ देश में सत्यरथ नाम का एक राजा था: सब धर्मों में लगा हुआ, धीर, सुशील और अपने वचन का सच्चा।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.16

स्कन्द पुराण ३.३.६.२२

विदर्भनृपतिः सोऽथ कृत्वा युद्धं सुदारुणम् ।। प्रनष्टोरुबलैः शाल्वैर्निहतो रणमूर्धनि ।। २२ ।।

भयंकर युद्ध करने के बाद विदर्भ का वह राजा शाल्वों के हाथों रणभूमि में मारा गया।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.22

स्कन्द पुराण ३.३.६.२९

तत्र दैववशाद्राज्ञी विजने तरुकुट्टिमे ।। असूत तनयं साध्वी मूहूर्ते सद्गुणान्विते ।। २९ ।।

वहाँ भाग्यवश उस सूने स्थान में, पेड़ के नीचे, साध्वी रानी ने शुभ मुहूर्त में एक पुत्र को जन्म दिया।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.29

स्कन्द पुराण ३.३.६.३०

अथ सा राजमहिषी पिपासाभिहता भृशम् ।। सरोऽवतीर्णा चार्वंगी ग्रस्ता ग्राहेण भूयसा ।। ३.३.६.३० ।।

फिर प्यास से बहुत व्याकुल रानी सरोवर में उतरी, और एक बड़े मगर ने उसे पकड़ लिया।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.30

स्कन्द पुराण ३.३.६.३४

एकात्मजा बंधुहीना याञ्चामार्गवशंगता।। उमानाम द्विजसतीददर्श नृपनंदनम्।। ३४ ।।

एक ही पुत्र वाली, बंधुओं से रहित और भिक्षा पर जीने को विवश उमा नाम की ब्राह्मणी ने उस राजकुमार को देखा।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.34

स्कन्द पुराण ३.३.६.४१

कश्चित्समाययौ भिक्षुः साक्षाद्देवः शिवः स्वयम् ॥ तामाह भिक्षुवर्योथ विप्रभामिनि मा खिदः ॥ ११ ॥

तभी एक भिक्षु आया, जो स्वयं भगवान शिव थे। उस श्रेष्ठ भिक्षु ने उससे कहा: हे ब्राह्मणी, दुःखी मत हो।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.41

स्कन्द पुराण ३.३.६.४४

तमर्भकं समादाय निजमेव गृहं ययौ ॥ भिक्षुवाक्येन विश्रब्धा सा राज तनयं सती ॥ ४४ ॥

वह उस बालक को लेकर अपने घर गई; भिक्षु के वचन से निश्चिंत होकर उस साध्वी ने राजकुमार को (अपने पुत्र की तरह पाला)।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.44

स्कन्द पुराण ३.३.६.५०

तौ दृष्ट्वा बालकौ धीमाञ्छांडिल्यो मुनिरब्रवीत् ॥ अहो दैवबलं चित्रमहो कर्म दुरत्ययम् ॥ ३.३.६.५० ॥

उन दोनों बालकों को देखकर बुद्धिमान शांडिल्य मुनि बोले: अहो, भाग्य का बल विचित्र है, कर्म को पार करना कठिन है!

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.50

स्कन्द पुराण ३.३.६.६२

स राजा सर्वधर्मज्ञः पालयन्सकलां महीम् ।। प्रदोषसमये शंभुं कदा चित्प्रत्यपूजयत् ।। ६२ ।।

(शांडिल्य बोले: पिछले जन्म में पांड्य देश का राजा रहते हुए) वह राजा सब धर्मों का ज्ञाता था और पूरी पृथ्वी का पालन करता था; एक बार वह प्रदोष के समय शंभु की पूजा कर रहा था।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.62

स्कन्द पुराण ३.३.६.६७

स तथैव महीपालो विसृज्य शिवपूजनम् ।। असमाप्तात्मनियमश्चकार निशि भोजनम् ।। ६७ ।।

उसी तरह उस राजा ने शिव-पूजा छोड़ दी, और अपना नियम पूरा किए बिना रात में भोजन कर लिया।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 6, Sanskrit Wikisource, revision 68267, Brahmottara Khanda 6.67

स्कन्द पुराण ३.३.७.८४

ततः प्रभृति तौ बालौ मुनिवर्योपदेशतः ।। प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजां चक्रतुरंजसा ।। ८४ ।।

उसी समय से वे दोनों बालक मुनिश्रेष्ठ के उपदेश के अनुसार प्रदोष में पार्वतीपति की पूजा नियम से करने लगे।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.84

स्कन्द पुराण ३.३.७.८७

तत्र निर्झरनिर्घातनिर्भिन्ने वप्र कुट्टिमे ।। निधानकलशं स्थूलं प्रस्फुरंतं ददर्श ह ।। ८७ ।।

वहाँ झरने की धार से कटे किनारे में उस (ब्राह्मण-पुत्र) ने एक बड़ा, चमकता हुआ खज़ाने का कलश देखा।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.87

स्कन्द पुराण ३.३.७.१२०

अस्त्येको द्रविकोनाम गंधर्वाणां कुलाग्रणीः ॥ तस्याहमस्मि तनया नाम्ना चांशुमती स्मृता ॥ 3.3.7.१२० ॥

(गंधर्व-कन्या बोली:) द्रविक नाम का एक गंधर्व है, जो गंधर्वों के कुल में अग्रणी है; मैं उसकी पुत्री हूँ, मेरा नाम अंशुमती है।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.120

स्कन्द पुराण ३.३.७.१४३

अत एनां प्रयच्छामि कन्यामंशुमतीं तव ।। हत्वा शत्रून्स्वराष्टे त्वां स्थापयामि शिवाज्ञया ।। ४३ ।।

(गंधर्वराज बोले:) इसलिए मैं अपनी यह कन्या अंशुमती तुम्हें देता हूँ, और शिव की आज्ञा से शत्रुओं को मारकर तुम्हें तुम्हारे राज्य में स्थापित करूँगा।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.143

स्कन्द पुराण ३.३.७.१५७

ततोभिषिक्तः सचिवैर्ब्राह्मणैश्च महोत्तमैः ।। रत्नसिंहासनारूढश्चक्रे राज्यमकण्टकम् ।। ५७ ।।

फिर मंत्रियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उसका अभिषेक किया, और वह रत्न-सिंहासन पर बैठकर निष्कंटक राज्य करने लगा।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.157

स्कन्द पुराण ३.३.७.१५८

या विप्रवनिता पूर्वं तमपुष्णात्स्वपुत्रवत् ।। सैव माताभवत्तस्य स भ्राता द्विजनन्दनः ।। ५८ ।।

जिस ब्राह्मणी ने पहले उसे अपने पुत्र की तरह पाला था, वही उसकी माता बनी, और वह ब्राह्मण-पुत्र उसका भाई।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.158

स्कन्द पुराण ३.३.७.१५९

गंधर्वतनया जाया विदर्भनगरेश्वरः ।। आराध्य देवं गिरिशं धर्मगुप्तो नृपोऽभवत् ।। ५९ ।।

गंधर्व-कन्या उसकी पत्नी बनी, और गिरिश (शिव) की आराधना करके धर्मगुप्त विदर्भ नगर का स्वामी राजा बना।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.159

स्कन्द पुराण ३.३.७.१६०

एवमन्ये समाराध्य प्रदोषे गिरिजापतिम् ।। लभंतेभीप्सितान्कामान्देहांते तु परां गतिम् ।। 3.3.7.१६० ।।

इसी तरह दूसरे लोग भी प्रदोष में गिरिजापति की आराधना करके मनचाही कामनाएँ पाते हैं, और देह छूटने पर परम गति पाते हैं।

स्रोत: Skanda Purana 3 (Brahma Khanda), Brahmottara Khanda ch. 7, Sanskrit Wikisource, revision 68379, Brahmottara Khanda 7.160

स्रोत और लाइसेंस

चुने हुए श्लोक स्रोत पृष्ठों से अक्षरशः लिए गए हैं। अध्याय ७ में १०० के बाद स्रोत क्रमांक छोटा करके लिखता है (जैसे १२० को "3.3.7.१२०", पर कई जगह केवल अंतिम अंक) और कुछ जगह गलत; यहाँ स्थान-संकेत में क्रम से गिनी गई पूरी संख्या दी गई है। अध्याय ६ का श्लोक ४१ स्रोत में "११" अंकित है। अध्याय ६ के श्लोक ३८ में जाति के आधार पर बालक को छूने की हिचक का वर्णन है; वह यहाँ नहीं लिया गया। प्रदोष-पूजा की विधि अलग पाठ "प्रदोष व्रत" में है। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है।

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