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सत्यनारायण व्रत कथा: मूल पाठ और अर्थ
कथा · 25 पद · मूल भाषा: संस्कृत
सत्यनारायण व्रत कथा के बारे में
भविष्य पुराण में सूत जी शौनक आदि ऋषियों को सत्यनारायण व्रत की कथा सुनाते हैं। नारद की प्रार्थना पर विष्णु यह व्रत प्रकट करते हैं; काशी का निर्धन ब्राह्मण शतानंद और राज्य खो चुके राजा चंद्रचूड़ इसे करके सुख पाते हैं। साधु वणिक संतान मिलने पर पूजा का वचन देकर भूल जाता है और दामाद सहित कारागार में पड़ता है; उसकी पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती की पूजा से वह छूटता है, पर प्रसाद की अवहेलना से दामाद की नाव डूब जाती है, और प्रसाद लेने पर वह लौट आता है। प्रचलित सत्यनारायण कथा-पुस्तिका प्रायः स्कन्द पुराण (रेवा खण्ड) के नाम से छपे एक दूसरे पाठ पर आधारित होती है; यहाँ भविष्य पुराण का पाठ है, इसलिए नाम और घटनाएँ पुस्तिका से कुछ अलग हैं। यहाँ कथा के मुख्य श्लोक दिए गए हैं।
पाठ: भविष्य पुराण (प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड २, अध्याय २४–२९) (Puranic)
अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।
मूल पाठ और अर्थ
भविष्य पुराण ३.२.२४.१
एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः ।। पृच्छन्ति विनयेनैव सूतं पौराणिकं खलु ।। १ ।।
एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों ने पुराणों के ज्ञाता सूत जी से विनयपूर्वक पूछा।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 24, Sanskrit Wikisource, revision 74736, Pratisarga Parva 2.24.1
भविष्य पुराण ३.२.२४.७
एकदा नारदो योगी परानुग्रहवांच्छया ।। पर्यटन्विविधाँल्लोकान्मर्त्यलोकमुपागमत् ।। ७ ।।
एक बार योगी नारद दूसरों पर कृपा करने की इच्छा से अनेक लोकों में घूमते हुए मृत्युलोक (पृथ्वी) पर आए।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 24, Sanskrit Wikisource, revision 74736, Pratisarga Parva 2.24.7
भविष्य पुराण ३.२.२४.९
केनोपायेन चैतेषां दुःखनाशो भवेद्ध्रुवम्।। इति सञ्चिंत्य मनसा विष्णुलोकं गतस्तदा ।। ९ ।।
"किस उपाय से इनका दुःख निश्चित रूप से मिटे?" मन में यह सोचकर वे तब विष्णुलोक गए।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 24, Sanskrit Wikisource, revision 74736, Pratisarga Parva 2.24.9
भविष्य पुराण ३.२.२५.२
काशीपुरीति विख्याता तत्रासीद्ब्राह्मणो वरः ।। दीनो गृहाश्रमी नित्यं भिक्षुः पुत्रकलत्रवान् ।। २ ।।
काशी नाम की प्रसिद्ध नगरी में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था: निर्धन गृहस्थ, पत्नी और बच्चों वाला, जो सदा भिक्षा पर जीता था।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738, Pratisarga Parva 2.25.2
भविष्य पुराण ३.२.२५.३
शतानंद इति ख्यातो विष्णुव्रतपरायणः ।। एकदा पथि भिक्षार्थं गच्छतस्तस्य श्रीपतिः ।। ३ ।।
उसका नाम शतानंद था और वह विष्णु के व्रतों में लगा रहता था। एक बार जब वह भिक्षा के लिए रास्ते पर जा रहा था, तब लक्ष्मीपति...
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738, Pratisarga Parva 2.25.3
भविष्य पुराण ३.२.२५.४
विनीतस्यातिशांतस्य स बभूवाक्षिगोचरः ।। वृद्धब्राह्मणवेषेण पप्रच्छ ब्राह्मणं हरिः ।। क्व यासीति द्विजश्रेष्ठ वृत्तिः कामेन कथ्यताम् ।। ४ ।।
...उस विनम्र और शांत ब्राह्मण के सामने प्रकट हुए। बूढ़े ब्राह्मण के वेश में हरि ने पूछा: हे द्विजश्रेष्ठ, कहाँ जा रहे हो? अपनी जीविका बताओ।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738, Pratisarga Parva 2.25.4
भविष्य पुराण ३.२.२५.७
ममोपदेशतो विप्र सत्यनारायणं भज ।। दारिद्र्यशोकशमनं संतापहरणं हरेः ।। चरणं शरणं याहि मोक्षदं पद्मलोचनम् ।। ।। ७ ।।
हे विप्र, मेरे उपदेश से सत्यनारायण का भजन करो। दरिद्रता और शोक मिटाने वाले, संताप हरने वाले, मोक्ष देने वाले कमलनयन हरि के चरणों की शरण लो।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738, Pratisarga Parva 2.25.7
भविष्य पुराण ३.२.२५.३६
विना देहीति वचनं लब्धा च विपुलं धनम् ।। कौतुकायासमनसा जगाम निजमालयम् ।। ३६।।
बिना "दे दो" कहे ही उसे बहुत धन मिल गया, और आश्चर्य से भरा वह अपने घर गया।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738, Pratisarga Parva 2.25.36
भविष्य पुराण ३.२.२५.३९
भक्त्या तुतोष भगवान्सत्यनारायणः स्वयम् ।। कामं दित्सुः प्रादुरासीत्कथांते भक्तवत्सलः ।। ३९ ।।
उसकी भक्ति से स्वयं भगवान सत्यनारायण प्रसन्न हुए, और भक्तों से प्रेम करने वाले प्रभु कथा के अंत में वर देने के लिए प्रकट हुए।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738, Pratisarga Parva 2.25.39
भविष्य पुराण ३.२.२६.१
राजासीद्धार्मिकः कश्चित्केदारमणिपूरके ।। चन्द्रचूड इति ख्यातः प्रजापालनतत्परः ।।१।।
केदार-मणिपूर में चंद्रचूड़ नाम का एक धर्मात्मा राजा था, जो प्रजा के पालन में लगा रहता था।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 26, Sanskrit Wikisource, revision 74740, Pratisarga Parva 2.26.1
भविष्य पुराण ३.२.२६.११
द्विजराज नमस्तुभ्यं सदानंद महामते ।। भ्रष्टराज्यं च मां ज्ञात्वा कृपया मां समुद्धर ।। ११ ।।
(राजा बोले:) हे द्विजश्रेष्ठ, महामति सदानंद, आपको नमस्कार। मुझे राज्य से वंचित जानकर कृपा करके मेरा उद्धार करें।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 26, Sanskrit Wikisource, revision 74740, Pratisarga Parva 2.26.11
भविष्य पुराण ३.२.२६.२१
पौर्णमास्यां विधानेन मासिमासि नृपोत्तमः।। अपूजयत्सत्यदेवं प्रेमभक्तिसमन्वितः।।२१।।
वह श्रेष्ठ राजा हर महीने पूर्णिमा को विधि से, प्रेम और भक्ति के साथ सत्यदेव की पूजा करता था।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 26, Sanskrit Wikisource, revision 74740, Pratisarga Parva 2.26.21
भविष्य पुराण ३.२.२८.३
अथ रत्नपुरस्थायी साधुर्लक्षपतिर्वणिक् ।। धनैरापूर्य तरणीः सह गच्छन्नदीतटे ।। ३ ।।
फिर रत्नपुर में रहने वाला साधु नाम का एक लखपति वणिक धन से नावें भरकर नदी के किनारे-किनारे जा रहा था।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 28, Sanskrit Wikisource, revision 74744, Pratisarga Parva 2.28.3
भविष्य पुराण ३.२.२८.१४
पुत्रं वा यदि वा कन्यां लभेयं त्वत्प्रसादतः ।। पताकां कांचनीं कृत्वा पूजयिष्ये कृपानिधिम् ।। १४ ।।
(उसने प्रार्थना की:) यदि आपकी कृपा से मुझे पुत्र या पुत्री मिले, तो मैं सोने की पताका बनवाकर कृपानिधि भगवान की पूजा करूँगा।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 28, Sanskrit Wikisource, revision 74744, Pratisarga Parva 2.28.14
भविष्य पुराण ३.२.२८.२०
विप्रानाहूय वेदज्ञान्कारयामास मंगलम् ।। लेखयित्वा जन्मपत्रीं नाम चक्रे कलावतीम् ।। 3.2.28.२० ।।
उसने वेद जानने वाले ब्राह्मणों को बुलाकर मंगल-कार्य कराया, जन्मपत्री लिखवाई और (कन्या का) नाम कलावती रखा।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 28, Sanskrit Wikisource, revision 74744, Pratisarga Parva 2.28.20
भविष्य पुराण ३.२.२८.३०
कुर्वन्क्रयं विक्रयं च चिरं तस्थौ महामनाः ।। कर्मणा मनसा वाचा न कृतं सत्यसेवनम् ।। 3.2.28.३० ।।
खरीद-बिक्री करते हुए वह वहाँ लंबे समय तक रहा, पर कर्म, मन या वाणी से उसने सत्यदेव की सेवा नहीं की।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 28, Sanskrit Wikisource, revision 74744, Pratisarga Parva 2.28.30
भविष्य पुराण ३.२.२९.८
अथैकस्मिन्दिने कन्या भोजनाच्छादनं विना ।। गता विप्रगृहेऽपश्यत्सत्यनारायणार्चनम् ।। ८ ।।
एक दिन भोजन और वस्त्र के बिना (विपत्ति में पड़ी) वह कन्या एक ब्राह्मण के घर गई और वहाँ सत्यनारायण की पूजा होते देखी।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.8
भविष्य पुराण ३.२.२९.१९
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र तौ साधू परिमोचय ।। अपराधं विना बद्धौ नो चेच्छं न भवेत्तव ।। १९ ।।
(भगवान ने स्वप्न में राजा से कहा:) उठो, राजन्, उन दोनों सज्जनों को छोड़ दो; वे बिना अपराध के बंधे हैं, नहीं तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.19
भविष्य पुराण ३.२.२९.३६
इत्युक्तस्तापसः प्राह तथास्त्विति वचः क्षणात् ।। धनमंतर्दधे साधोर्लतापत्रावशेषितम् ।। ३६ ।।
(साधु ने तपस्वी से कहा था कि नावों में केवल लताएँ और पत्ते हैं।) यह सुनकर तपस्वी ने कहा "ऐसा ही हो", और क्षण भर में साधु का धन गायब हो गया; केवल लताएँ और पत्ते रह गए।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.36
भविष्य पुराण ३.२.२९.४८
सत्यरूपं सत्यसंधं सत्यनारायणं हरिम् ।। यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ।। ४८ ।।
(साधु ने स्तुति की:) जो सत्य-स्वरूप हैं, सत्य-प्रतिज्ञ हैं, जिनके सत्य से जगत सत्य है, उन सत्यनारायण हरि, आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.48
भविष्य पुराण ३.२.२९.५८
कलावती त्ववज्ञाय प्रसादं सत्वरा ययौ ।। पातुं पतिमुखांभोजं चकोरीव दिनात्यये ।। ५८ ।।
पर कलावती प्रसाद की अवहेलना करके जल्दी से चल पड़ी, जैसे संध्या के समय चकोरी, पति के मुख-कमल को देखने के लिए।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.58
भविष्य पुराण ३.२.२९.५९
अवज्ञानात्प्रसादस्य नौकाशंखपतेरथ ।। निमग्ना जलमध्ये तु जामात्रा सह तत्क्षणात् ।। ५९ ।।
प्रसाद की अवहेलना के कारण उसी क्षण शंखपति की नाव दामाद सहित जल में डूब गई।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.59
भविष्य पुराण ३.२.२९.६५
साधो कलावती क्षिप्रं मत्प्रसादं हि भोजयेत् ।। तत्पश्चादिह संप्राप्य पतिं प्राप्स्यति मा शुचः ।। ६५ ।।
(आकाशवाणी हुई:) हे साधु, कलावती जल्दी जाकर मेरा प्रसाद खाए; उसके बाद यहाँ आकर वह अपने पति को पाएगी, शोक मत करो।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.65
भविष्य पुराण ३.२.२९.६६
इत्याकाशे वचः श्रुत्वा विस्मिता तच्चकार सा ।। नारायणस्य कृपया पतिं प्राप्ता कलावती ।। ६६ ।।
आकाश में यह वाणी सुनकर चकित कलावती ने वैसा ही किया, और नारायण की कृपा से उसे अपना पति मिल गया।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.66
भविष्य पुराण ३.२.२९.६९
इतिहासमिमं भक्त्या शृणुयाद्यो हि मानवः ।। सोऽपि विष्णुप्रियतरः कामसिद्धिमवाप्नुयात् ।। ।। ६९ ।।
जो मनुष्य भक्ति से यह इतिहास सुनता है, वह भी विष्णु का अत्यंत प्रिय होता है और उसकी कामनाएँ पूरी होती हैं।
स्रोत: Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746, Pratisarga Parva 2.29.69
स्रोत और लाइसेंस
- Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 24, Sanskrit Wikisource, revision 74736. CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription); underlying text public domain
- Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 25, Sanskrit Wikisource, revision 74738. CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription); underlying text public domain
- Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 26, Sanskrit Wikisource, revision 74740. CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription); underlying text public domain
- Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 28, Sanskrit Wikisource, revision 74744. CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription); underlying text public domain
- Bhavishya Purana 3 (Pratisarga Parva), Khanda 2 ch. 29, Sanskrit Wikisource, revision 74746. CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription); underlying text public domain
चुने हुए श्लोक स्रोत पृष्ठों से अक्षरशः लिए गए हैं, स्रोत के "3.2.28.20" जैसे क्रमांक-रूपों सहित। स्रोत ब्राह्मण का नाम अध्याय २५ में "शतानंद" और अध्याय २६–२७ में "सदानंद" लिखता है। अध्याय २७ (भीलों की कथा) से कोई श्लोक नहीं लिया गया। पूजा की विधि अलग पाठ "सत्यनारायण पूजा" में है। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है।