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शिवरात्रि व्रत कथा: मूल पाठ और अर्थ

कथा · 16 पद · मूल भाषा: संस्कृत

शिवरात्रि व्रत कथा के बारे में

शिव पुराण में सूत जी ऋषियों को गुरुद्रुह नाम के एक भील शिकारी की कथा सुनाते हैं। शिवरात्रि की रात वह भूखा-प्यासा एक बेल के पेड़ पर बैठा शिकार की प्रतीक्षा करता रहा, और हर प्रहर में उससे अनजाने में जल और बेलपत्र नीचे के शिवलिंग पर गिरते रहे। अपना वचन निभाने लौटे हिरन-परिवार को देखकर उसका हृदय बदल गया; शिव ने प्रकट होकर उसे 'गुह' नाम और वरदान दिए। कथा कहती है कि अनजाने में किया गया व्रत भी इतना फल देता है, तो भक्ति से किया गया व्रत और भी अधिक। यहाँ कथा के मुख्य श्लोक दिए गए हैं।

पाठ: शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय ४०) (Puranic)

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

शिव पुराण ४.४०.३

श्रूयतामृषयस्सर्वे कथयामि पुरातनम्।। इतिहासं निषादस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।। ३ ।।

सूत बोले: हे सभी ऋषियो, सुनिए। मैं एक निषाद (शिकारी) का पुराना इतिहास सुनाता हूँ, जो सब पापों का नाश करने वाला है।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.3

शिव पुराण ४.४०.४

पुरा कश्चिद्वने भिल्लो नाम्ना ह्यासीद्गुरुद्रुहः।। कुटुम्बी बलवान्क्रूरः क्रूरकर्मपरायणः ।।४।।

पहले किसी वन में गुरुद्रुह नाम का एक भील रहता था। वह परिवार वाला, बलवान, क्रूर और क्रूर कर्मों में लगा रहने वाला था।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.4

शिव पुराण ४.४०.७

कदाचिच्छिवरात्रिश्च प्राप्तासीत्तत्र शोभना ।। न दुरात्मा स्म जानाति महद्वननिवासकृत् ।। ७ ।।

एक बार वहाँ शुभ शिवरात्रि आई, पर घने वन में रहने वाला वह दुष्ट उसे जानता तक नहीं था।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.7

शिव पुराण ४.४०.८

एतस्मिन्समये भिल्लो मात्रा पित्रा स्त्रिया तथा।। प्रार्थितश्च क्षुधाऽविष्टैर्भक्ष्यं देहि वनेचर।।८।।

उसी समय भूख से व्याकुल उसके माता, पिता और पत्नी ने उससे विनती की: हे वनवासी, हमें कुछ खाने को दो।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.8

शिव पुराण ४.४०.१५

इति मत्वा स वै वृक्षमेकं बिल्वेतिसंज्ञकम्।। समारुह्य स्थितस्तत्र जलमादाय भिल्लकः ।।१५।।

यह सोचकर वह भील जल लेकर बेल नाम के एक पेड़ पर चढ़ गया और वहीं बैठ गया।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.15

शिव पुराण ४.४०.१७

तद्रात्रौ प्रथमे यामे मृगी त्वेका समागता ।। तृषार्ता चकिता सा च प्रोत्फालं कुर्वती तदा ।। १७ ।।

उस रात के पहले प्रहर में एक हिरनी आई, जो प्यासी और डरी हुई थी और उछलती हुई चल रही थी।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.17

शिव पुराण ४.४०.१९

इत्येवं कुर्वतस्तस्य जलं बिल्वदलानि च ।। पतितानि ह्यधस्तत्र शिवलिंगमभूत्ततः ।।१९।।

ऐसा करते हुए (धनुष पर बाण चढ़ाते समय) उससे जल और बेलपत्र नीचे गिर पड़े, जहाँ एक शिवलिंग था।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.19

शिव पुराण ४.४०.२०

यामस्य प्रथमस्यैव पूजा जाता शिवस्य च ।। तन्महिम्ना हि तस्यैव पातकं गलितन्तदा ।।4.40.२०।।

इस तरह पहले प्रहर की शिव-पूजा हो गई, और उसकी महिमा से उसी समय उसका पाप गल गया।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.20

शिव पुराण ४.४०.२९

स्थिता सत्येन धरणी सत्येनैव च वारिधिः ।। सत्येन जलधाराश्च सत्ये सर्वम्प्रतिष्ठितम् ।।२९।।

(हिरनी बोली:) धरती सत्य पर टिकी है, समुद्र सत्य से ही टिका है, जलधाराएँ सत्य से बहती हैं; सब कुछ सत्य पर ही प्रतिष्ठित है।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.29

शिव पुराण ४.४०.३९

यामस्य च द्वितीयस्य तेन शंभोर्महात्मनः ।। पूजा जाता प्रसंगेन व्याधस्य सुखदायिनी ।। ३९ ।।

इस तरह संयोग से दूसरे प्रहर में भी महात्मा शंभु की पूजा हो गई, जो उस शिकारी के लिए सुख देने वाली बनी।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.39

शिव पुराण ४.४०.५३

तेन तृतीययामस्य तद्रात्रौ तस्य भाग्यतः ।। पूजा जाता शिवस्यैव कृपालुत्वं प्रदर्शितम् ।।५३।।

इस तरह उसके भाग्य से उस रात तीसरे प्रहर की शिव-पूजा भी हो गई; शिव ने अपनी कृपालुता दिखाई।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.53

शिव पुराण ४.४०.७८

तेन जाता चतुर्थस्य पूजा यामस्य वै शुभा ।। तस्य पापन्तदा सर्वं भस्मसादभवत् क्षणात् ।। ७८ ।।

इससे चौथे प्रहर की शुभ पूजा भी हो गई, और उसी क्षण उसका सारा पाप जलकर भस्म हो गया।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.78

शिव पुराण ४.४०.८५

इति ज्ञानं समापन्नो बाणं संवारयंस्तदा ।। गम्यतां च मृगश्रेष्ठा धन्याः स्थ इति चाब्रवीत् ।। ८५ ।।

ऐसा ज्ञान पाकर उसने बाण रोक लिया और कहा: हे श्रेष्ठ हिरनो, जाओ, तुम धन्य हो।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.85

शिव पुराण ४.४०.८७

संस्पृश्य कृपया शंभुस्तं व्याधं प्रीतितोऽब्रवीत् ।। वरं ब्रूहि प्रसन्नोऽस्मि व्रतेनानेन भिल्लक ।। ८७ ।।

शंभु ने कृपा से उस शिकारी को छुआ और प्रेम से कहा: हे भील, इस व्रत से मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.87

शिव पुराण ४.४०.८९

शिवोऽपि सुप्रन्नात्मा नाम दत्वा गुहेति च ।। विलोक्य तं कृपादृष्ट्या तस्मै दिव्यान्वरानदात् ।।।८९।।

अत्यंत प्रसन्न शिव ने उसे 'गुह' नाम दिया, कृपा-दृष्टि से उसे देखा और दिव्य वर दिए।

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.89

शिव पुराण ४.४०.९७

अज्ञानात्स व्रतञ्चैतत्कृत्वा सायुज्यमाप्तवान् ।। किं पुनर्भक्तिसंपन्ना यान्ति तन्मयतां शुभाम्।।९७।।

उसने अनजाने में यह व्रत करके भी शिव-सायुज्य (शिव से एकत्व) पाया; तो भक्ति से भरे लोग इसे करके शुभ तन्मयता क्यों न पाएँगे?

स्रोत: Shiva Purana 4 (Koti Rudra Samhita) ch. 40, Sanskrit Wikisource, revision 104503, Koti Rudra Samhita 40.97

स्रोत और लाइसेंस

कथा के चुने हुए श्लोक स्रोत पृष्ठ से अक्षरशः लिए गए हैं, स्रोत के क्रमांक-रूपों सहित (जैसे "4.40.20")। श्लोक ८९ में स्रोत का "सुप्रन्नात्मा" संभवतः "सुप्रसन्नात्मा" है। हिरनों की शपथों (४०.३२–३४, ४०.४४–४७, ४०.६४–६६) में पापों की सूचियाँ हैं, जिनमें कुछ जाति से जुड़ी हैं; वे यहाँ नहीं दी गईं। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है।

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