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विठ्ठल की काकड आरती: मूल पाठ और अर्थ

आरती · 6 पद · मूल भाषा: मराठी

विठ्ठल की काकड आरती के बारे में

मराठी वारकरी परंपरा की एक काकड आरती (भोर में गाई जाने वाली आरती)। इसमें भक्त बताता है कि सद्गुरु की कृपा से उसने भीतर ही पंढरपुर और विठ्ठल के दर्शन किए, उसका 'मैं'-पन मिट गया, और भीतर विठ्ठल की ऐसी आरती जली जिसके तेज में सूर्य और चंद्र भी फीके पड़ गए।

पाठ: निवृत्ति (अंतिम पंक्ति में आया नाम) (pre-1911 (in the book's first edition))

अर्थ और सार इस संग्रह के लिए उद्धृत संस्करण से लिखे गए संपादकीय हैं।

मूल पाठ और अर्थ

चरण १

फळलें भाग्य माझें । धन्य झालों संसारीं । सद्गुरु भेटले हो । त्यानीं धरियेलें करीं । पश्चिमे चालवीलें । आत्मा तेथें निर्धारी । त्रिकुटावरी नांदे | देखियेली पंढरी ॥ १॥

मेरा भाग्य फलित हुआ, इस संसार में मैं धन्य हो गया। सद्गुरु मिले और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उन्होंने मुझे पश्चिम-मार्ग (योग का भीतरी मार्ग) पर चलाया, जहाँ निश्चय ही आत्मा है। त्रिकूट (भौंहों के बीच के स्थान) पर निवास करके मैंने पंढरी के दर्शन किए।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 5 (PDF p. 41), Marathi Wikisource, revision 224157, Kakad aarti no. 5, stanza 1 (book p. 5)

ध्रुवपद (टेक)

तें सुख काय सांगूं । वाचें बोलता नये । आरतीचेनि योगें । गेलें मीपण माये ॥ धृ०॥

उस सुख का क्या वर्णन करूँ, वह वाणी से कहा नहीं जाता। हे माँ, इस आरती के योग से मेरा 'मैं'-पन चला गया।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 5 (PDF p. 41), Marathi Wikisource, revision 224157, Kakad aarti no. 5, refrain (book p. 5)

चरण २

राउळामाजीं जातां । राहे देह-अवस्था | मन हें उन्मन झालें । नसे बद्धतेची वार्ता । हेंतु हा मावळला | शब्दा आली निःशब्द्वता | तटस्थ होउनि ठेलें । निजरूप पाहतां ॥२॥

मंदिर के भीतर जाते ही देह की सुध थम गई। मन उन्मन (मन के पार) हो गया, बंधन की बात तक न रही। हेतु (कोई प्रयोजन) अस्त हो गया, शब्द निःशब्द हो गए; अपना सच्चा स्वरूप देखते हुए मैं स्थिर खड़ा रह गया।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 5 (PDF p. 41), Marathi Wikisource, revision 224157, Kakad aarti no. 5, stanza 2 (book p. 5)

चरण ३

त्रिगुण गुण बाई । पूर्ण उजळल्या वाती । नवलाव अविनाश । न जाये स्वयंज्योती । लावितां लक्ष तेथें । हालूं विसरलीं पातीं । नातुडे मन माझें । न कळे दिवसराती ॥३॥

हे सखी, तीनों गुण बत्तियाँ बनकर पूरी तरह जल उठे। यह अचरज की, कभी न मिटने वाली, अपने-आप जलने वाली ज्योति बुझती नहीं। वहाँ ध्यान लगाते ही पलकें झपकना भूल गईं; मेरा मन पकड़ में नहीं आता, दिन-रात का पता नहीं चलता।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 6 (PDF p. 42), Marathi Wikisource, revision 225152, Kakad aarti no. 5, stanza 3 (book p. 6)

चरण ४

आरती विठ्ठलाची । पूर्ण उजळली अंतरीं । प्रकाश थोर झाला । सांठवेना अंबरीं । रविशशि मावळले । तया तेजामाझारीं । वाजतीं दिव्यवाद्ये । अनहत गजरीं ॥४॥

विठ्ठल की आरती भीतर पूरी तरह जल उठी। इतना बड़ा प्रकाश हुआ कि आकाश में भी न समाया। उस तेज में सूर्य और चंद्र भी अस्त हो गए, और अनाहत नाद के घोष में दिव्य वाद्य बजने लगे।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 6 (PDF p. 42), Marathi Wikisource, revision 225152, Kakad aarti no. 5, stanza 4 (book p. 6)

चरण ५

आनंदसागरांत । प्रेमें बुडी दिधली । लाधलें सौख्य मोठें । नये बोलतां बोलीं सद्गुरूचेनि संगें । ऐसी आरती केली । निवृत्ति आनंदांत । तेथें वृत्ति निमाली ॥५॥

मैंने प्रेम से आनंद के सागर में डुबकी लगाई और ऐसा बड़ा सुख पाया जो बोलकर कहा नहीं जाता। सद्गुरु के संग ऐसी आरती की गई। निवृत्ति आनंद में है; वहाँ मन की सारी वृत्तियाँ शांत हो गईं।

स्रोत: Nityanemavali (comp. R. D. Ranade), 12th ed., Academy of Comparative Philosophy and Religion, Belgaum, 1987, p. 6 (PDF p. 42), Marathi Wikisource, revision 225152, Kakad aarti no. 5, stanza 5 (book p. 6)

स्रोत और लाइसेंस

पाठ "नित्यनेमावली" (संकलक गुरुदेव रा. द. रानडे; बारहवीं आवृत्ति, १९८७, अकॅडेमी ऑफ कंपेरेटिव्ह फिलॉसॉफी ॲन्ड रिलिजन, बेळगाव) के मराठी विकिस्रोत प्रतिलेखन से अक्षरशः लिया गया है; इस पुस्तक को प्रकाशक ने CC BY-SA 4.0 के अंतर्गत खुला किया है। छपी हुई वर्तनी ज्यों-की-त्यों है। यह पुस्तक की काकड आरती क्रमांक ५ है (पृ. ५–६), जो पहली आवृत्ति (१९११) से काकड आरती में है। पुस्तक लेखक का नाम नहीं देती; अंतिम पंक्ति में "निवृत्ति" नाम आता है। छपी पंक्तियाँ रखी गई हैं, केवल चरण-क्रमांक से पहले की खाली जगहें एक स्थान में बदली गई हैं। "हेंतु" और "निःशब्द्वता" जैसी वर्तनी छपे पाठ की है। अंत की "विठ्ठल, विठ्ठल..." नाम-धुन शामिल नहीं की गई। IAST लिप्यंतरण एक नियत नियम से बनाया गया है और मराठी उच्चारण का मार्गदर्शक नहीं है।

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