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अंतिम अपडेट · स्विस एफ़ेमेरिस, लाहिड़ी अयनांश

भरणी नक्षत्र: स्वामी शुक्र, देवता, चरण, नाम अक्षर और चंद्रमा की तारीख़ें

भरणी नक्षत्र क्या है?

भरणी 27 नक्षत्रों में दूसरा नक्षत्र है, 13°20′ मेष – 26°40′ मेष तक (निरयण 13°20′–26°40′)। इसका विंशोत्तरी स्वामी शुक्र है और देवता यम।

चंद्रमा अगली बार भरणी नक्षत्र में 23 नवंबर 2026, सुबह 4:15 IST से 24 नवंबर 2026, रात 2:02 IST तक रहेगा।

भरणी नक्षत्र का स्वामी कौन है?

विंशोत्तरी पद्धति में भरणी का स्वामी शुक्र है, इसलिए भरणी नक्षत्र में चंद्रमा के साथ जन्मे व्यक्ति का जीवन शुक्र की दशा से शुरू होता है। नीचे गण, योनि और नाड़ी वही हैं जो कुंडली मिलान में लिए जाते हैं।

क्रम2 / 27
विस्तार13°20′ मेष – 26°40′ मेष (13°20′–26°40′)
राशिमेष
विंशोत्तरी स्वामीशुक्र (20 वर्ष की दशा)
देवतायम
गणमनुष्य
योनिगज (हाथी)
नाड़ीमध्य

भरणी नक्षत्र के चरण और नाम अक्षर क्या हैं?

हर चरण 3°20′ का है। परंपरा से किसी चरण में जन्मे बच्चे का नाम उस चरण के अक्षर से रखा जाता है।

चरणविस्तारराशिनाम अक्षर
113°20′ मेष – 16°40′ मेषमेषली
216°40′ मेष – 20°00′ मेषमेषलू
320°00′ मेष – 23°20′ मेषमेषले
423°20′ मेष – 26°40′ मेषमेषलो

नक्षत्र से बच्चों के नाम

चंद्रमा अगली बार भरणी नक्षत्र में कब है?

पंचांग में दिन का नक्षत्र वही होता है जिसमें चंद्रमा हो। ये भरणी में चंद्रमा के अगले गोचर हैं।

चंद्रमा का प्रवेशचंद्रमा का निकासअवधि
21 घंटे 46 मिनट
22 घंटे 13 मिनट
23 घंटे 3 मिनट

शहर के अनुसार आज का पंचांग

अन्य नक्षत्र

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भरणी नक्षत्र का स्वामी कौन है?
शुक्र (20 वर्ष की विंशोत्तरी दशा)।
भरणी नक्षत्र किस राशि में है?
भरणी मेष में है: 13°20′ मेष – 26°40′ मेष।
भरणी नक्षत्र का गण क्या है?
मनुष्य; योनि गज (हाथी); नाड़ी मध्य।
भरणी नक्षत्र के नाम अक्षर कौन से हैं?
चरण 1 से 4: ली, लू, ले, लो।
भरणी नक्षत्र के देवता कौन हैं?
यम, तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार।
भरणी नक्षत्र अगली बार कब है?
चंद्रमा अगली बार भरणी नक्षत्र में 23 नवंबर 2026, सुबह 4:15 IST से 24 नवंबर 2026, रात 2:02 IST तक रहेगा।

स्थिति: निरयण राशिचक्र, लाहिड़ी (चित्रपक्ष) अयनांश, डेटा फ़ाइलों सहित स्विस एफ़ेमेरिस। समय भारतीय मानक समय (IST, UTC+05:30) में, जिस क्षण चंद्रमा या सूर्य सीमा पार करता है, मिनट तक (सेकंड छोड़कर)। यह क्षण हर जगह एक ही है, केवल घड़ी का समय बदलता है। स्वामी: विंशोत्तरी दशा क्रम (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46)। देवता: तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.1। गण, योनि, नाड़ी: हमारे कुंडली मिलान की अष्टकूट तालिकाएँ। नाम अक्षर: अवकहड़ा चक्र। गणना पद्धति